Thursday, 28 December 2017

हंगामा है क्यों बरपा ?

तलाक़, तलाक़, तलाक़
**तलाक़ ए बिदअत**
--------------------------------
दोस्तों ,
लोकसभा में आज मुस्लिम महिला बिल 2017 पारित हो गया । सेक्शन 2 से 7 तक जो इस बिल का हिस्सा हैं, उन को आप फोटो 1 में पढ़ सकते हैं और इस बिल के ऑब्जेक्ट्स एंड रीज़न्स भी आप फोटो नंबर 2 में पढ़ सकते हैं ।
इस बिल को लाने के उद्देश्य और कारणों में बताया गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने "तीन तलाक़"को बिदअत करार दिया है और पर्सनल लॉ बोर्ड की कोशिशों और भरोसा दिलाये जाने के बाद भी यह नहीं रुका है , इसलिये कानून बनाये जाने की ज़रुरत है ।
दोस्तों,
इस बिल के सेक्शन 2 को पढ़ें जिस में "तलाक़ "को परिभाषित किया गया है । इस के अनुसार तलाक़ ए बिदअत को अवैध करार दिया गया है यानि वही जिस को सुप्रीम कोर्ट ने तलाक़ ए बिदअत कहा है यानि एक ही वक़्त में तीन तलाक़ कह देना ।
ऐसा बिल में नहीं लिखा है कि किसी भी वैध तरीके से दिया जाने वाला तलाक़  भी अवैध होगा या कि मुसलमानों को अब तलाक़ देने के लिए उसी कानून का पालन करना होगा जो संसद ने हिंदुओं के लिये बना रखा है ।
इस बिल में वैध रूप से तीन हैज़ के तीन माह  की अवधि के पूरा होने पर जो तलाक़ हर माह दिए जाने का प्रावधान क़ुरान पाक़ में दिया गया है , उस को रद्द नहीं किया गया है ।
इस लिये जो आपत्ति है वह सिर्फ 3 साल की सज़ा के प्रावधान पर ही की जानी चाहिए ।
इस के लिये निम्न आधारों पर सुप्रीम कोर्ट जाना चाहिये
1. सजा के प्रावधान की आवश्यकता नहीं है और न ही ये अपराध की श्रेणी में आता है क्यों कि इस तरह दिया गया 3 तलाक़ जब गैर कानूनी घोषित कर दिया गया है तो विवाह नहीं टूटता और पति पत्नी पूर्व वत रह सकते हैं। इस लिए ये कानून औचित्यपूर्ण प्रतिबन्ध Reasonable Restriction नहीं होता बल्कि इसका विपरीत असर होगा और पत्नियां इस का दुरूपयोग कर सकतीं हैं और साथ रहने से इंकार इस झूठ आधार पर कर सकती हैं कि पति रखने को तैयार नहीं है।
इसका दुरुपयोग उसी तरह हो सकता है जिस तरह दहेज़ कानून और घरेलु हिंसा कानून का हुआ है ।
असल में सब कुछ मानवीय व्यवहार पर निर्भर है । किसी भी कुरुति को ख़त्म होना चाहिये और कानून का दुरूपयोग भी नहीं होना चाहिये। लेकिंन इस तरह सज़ा औचित्यपूर्ण प्रतिबन्ध नहीं है और किसी व्यक्ति को बिना अपराध 3 वर्ष कारागार में डाल रहा है। ये ऐसा अपराध घोषित किया गया है कि जिस कि कल्पना जुरिस्प्रूडेंस में नहीं की गयी। अपराध का मतलब है जो किसी को हर्ट यानि चोट और क्षति पहुंचाने वाला काम हो । शादी एक सिविल रिलेशन है । कल कोई कहेगा कि किसी भी तरह का तलाक़ या विवाह का ख़त्म करना कानूनी अपराध होना चाहिए यानि तलाक़ होगा ही नहीं ,  न हिदुओं में और न मुस्लिम में ।
ये अजीब स्थिति है कि एक तरफ विवाह को समाप्त हुआ भी नहीं माना जा रहा और दूसरी तरफ उस के टूटने की सजा भी 3 साल सुनाई जा रही है । अपराध शास्त्र में अपराध उस काम को माना जाता है जिस से किसी को क्षति यानि हर्ट हो । तो ये क्षति किस को हुई ? यानि पत्नी अगर उसे माफ़ कर दे या करना चाहे या उसे क्षति ही न माने तो उस दशा  में क्या होगा? ऐसी कोई व्यवस्था इस कानून में नहीं है इसलिए ये जुरिस्प्रूडेंस का अनूठा कानून है जो मोदी जी के नवरत्न कानून मंत्री जी की देन है जो कहना चाह रहे हैं कि विवाह तोड़ने का प्रयास भी अपराध होगा । इस तरह जो हिन्दू पति या पत्नी तलाक़ अदालत से नहीं ले पाते और अदालत इंकार कर देती है तो उनके लिये भी सज़ा का प्रावधान होना चाहिये
आखिर ये अपराध है किस के विरुद्ध ? पत्नी या समाज या राज्य , किसके विरुद्ध है? इस कानून से देश केसभी नागरिकों के बीच ""कानून के  समक्ष समानता """ नहीं रखी । विवाह तोड़ने का प्रयास यदि ग़लत तरीके से (जिस को कानून अवैध) कह रहा है तो वह अपराध होगा और दूसरी तरफ हिन्दू या कोई अन्य अगर अदालत से तलाक न ले सके तो वह अपराध नहीं होगा ये ग़लत वर्गीकरण  है और इस से कानून के समक्ष समानता खत्म होती है जब की संविधान का आर्टिकल 14 इस को मूल अधिकार बता कर इस की गारंटी देता है ।इस लिये ये  कानून संविधान विरोधी है । क्या कोई हिन्दू स्त्री अपने पति को ऐसे तथाकथित अपराध की सजा दिला सकती है ?
पर्सनल बोर्ड भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले को इस हद तक मान चुका है कि एक ही वक़्त में एक साथ 3 बार तलाक़ देना बिदअत  है ।
याद रहे कि भारत का संविधान उन प्रथाओं , रिवाज़ों, चलन को इज़ाज़त नहीं देता जो मूल अधिकारों के विरुद्ध हैं जब तक कि वे धर्म के आवश्यक अंग न हों । इस तरह से एक ही वक़्त में एक साथ 3 तलाक़ देना इस्लाम धर्म का आवश्यक अंग नहीं है ।
सती प्रथा, बाल विवाह, लड़कियों की हत्या और विधवा स्त्री के अधिकारों का हनन भी इसी आधार पर गैर कानूनी करार दिए गए क्यों कि वे हिन्दू धर्म/संस्कृति के आवश्यक अंग नहीं थे बल्कि कुरुति थीं जो मूल और मानवाधिकार का हनन करतीं थीं ।
इस बिल के सेक्शन 3, और 4 में सजा का प्रावधान जिस तलाक़ के लिए किया गया है वह वही तलाक़ है जो सेक्शन 2 में और ऑब्जेक्ट्स एंड रीजन्स में कहा गया है।
सेक्शन 2
2.  In this  Act, unless the context otherwise requires,—
(a) "electronic form" shall have the same meaning as assigned to it in clause (r) of sub-section (1) of section 2 of the Information  Technology  Act, 2000;
(b) "talaq" means  talaq-e-biddat  or any other similar form of  talaq  having the effect of instantaneous and irrevocable divorce pronounced by a muslim husband and
(c) "Magistrate" means a Magistrate of the First Class exercising jurisdiction under the Code of Criminal Procedure, 1973, in the area where a married Muslim woman resides.
Section 3 to 7
CHAPTER II
DECLARATION  OF  TALAQ  TO  BE  VOID  AND  ILLEGAL
3. Any pronouncement of  talaq  by a person upon his wife, by words, either spoken or written or in electronic form or in any other manner whatsoever, shall be  void  and illegal.
4. Whoever pronounces  talaq  referred to in section 3 upon his wife shall be punished with imprisonment for a term which may extend to three years and fine.
CHAPTER III
PROTECTION  OF  RIGHTS  OF  MARRIED  MUSLIM  WOMEN
5. Without prejudice to the generality of the provisions contained in any other law for the time being in force, a married Muslim woman upon whom  talaq  is pronounced, shall be entitled to receive from her husband such amount of subsistence allowance for her and dependent children as may be determined by the Magistrate.
6. Notwithstanding anything contained in any other law for the time being in force, a married Muslim woman shall be entitled to custody of her minor children in the event of pronouncement of  talaq  by her husband, in such manner as may be determined by the Magistrate.
7. Notwithstanding anything contained in the Code of Criminal Procedure, 1973, an offence punishable under this  Act shall be cognizable and non-bailable within the meaning of the said Code.
....
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=672760533112226&id=100011348560875

عورت کے لئے کس کس سے پردہ؟

سوال… کیا فرماتے ہیں علمائے دین کہ عورت کے لیے پردہ کس کس سے ضروری ہے؟

والد اور والدہ کے چچا زاد، ماموں زاد، خالہ زاد، پھوپی زاد بھائی، بہنوں سے اور اسی طرح ان کی بیویوں سے پردہ کا حکم کیا ہے؟ اسی طرح ان کی بیٹیوں سے اور بیٹوں کی بیویوں سے پردہ کا حکم کیا ہے؟پھوپھی کے شوہر، اسی طرح بہن کے شوہر اور شوہر کی بہن کے شوہر سے پردہ کا حکم کیا ہے؟ اسی طرح وہ چچا زاد بہن یا خالہ زاد، ماموں زاد پھوپھی زاد جو عمر میں بہت بڑی ہے؟ شوہر کے چچا ماموں پھوپھا وغیرہ سے پردہ کا حکم کیا ہے؟ شوہر کے چھوٹے بھائی اور بڑے بھائیوں سے پردہ کا حکم کیا ہے؟ کیا اپنے چچا اپنے ماموں اپنے پھوپھا سے پردہ کرنا چاہیے کہ نہیں؟ آیا صرف اپنی بہن ،ماں، بھانجی، بھتیجی، اپنی ماسیوں، اپنی چچیوں سے پردہ نہیں ہے، یااس کے علاوہ بھی کوئی ہے؟

جواب… واضح رہے کہ مرد یا عورت کے لیے رشتہ داروں سے پردے کے بارے میں قاعدہ یہ ہے کہ جن رشتہ داروں سے (مرد یا عورت کا ) نکاح ہمیشہ کے لیے حرام ہے، اُن سے پردہ نہیں، مثلاً: ماں باپ، دادا، دادی، نانا، نانی، بھائی، بہن، چچا ، پھوپھی ، خالہ، بیٹا ،بیٹی، پوتا، پوتی وغیرہ۔

اور جن رشتہ داروں سے نکاح جائز ہے، ان سے پردہ کرنا واجب ہے، مثلاً : چچازاد، پھوپھی زاد، ماموں زاد، خالہ زاد بہن بھائی، پھوپھا، چچی، خالو، بہنوئی وغیرہ، اسی طرح عورت کے لیے اپنے شوہر کے ان رشتہ داروں سے پردہ نہیں ہے، جن رشتہ داروں کا عورت سے نکاح ہمیشہ کے لیے حرام ہے، مثلاً:سسر، سوتیلا بٹیا وغیرہ، اور شوہر کے وہ رشتہ دار جن سے اس عورت کا نکاح جائز ہے، ان سے پردہ کرنا واجب ہے، جیسے: شوہر کا بھائی (دیور)، شوہر کا چچا، شوہر کا ماموں، شوہر کا پھوپھا، شوہر کا خالو، شوہر کے بھائی کی اولاد اور شوہر کی بہن کی اولاد وغیرہ۔

وہ چچازاد، خالہ زاد، ماموں زاد، بہن یا اس کے علاوہ اور کوئی عورت اگر عمر رسیدہ ہو، بڑھاپے کی عمر تک پہنچ گئی ہو، اس کے ساتھ سلام یا ضروری بات کرنے میں کوئی حرج نہیں۔

مشترکہ فیملی میں پردہ کی صورت واہمیت
سوال… کیا فرماتے ہیں علمائے دین ومفتیان شرع مبین مسائل مذکور ہ کے بارے میں کہ ہمارے ہاں رواج ہے کہ اجنبی (غیر محرم) مرد، عورت سے بوقت ملاقات ہاتھ ملا کر مصافحہ کرتا ہے، اگر ہاتھ نہ ملائے تو ملامت کی جاتی ہے، ناراضگی کا اظہار کیا جاتا ہے، چاہے بظاہر دین دار گھرانہ کیوں نہ ہو، غیر محرم سے بے حجاب سامنے بیٹھ کر بات چیت ، ہنسی مزاق عام معمولات زندگی بن گیا ہے، بڑا دین دار سمجھا جانے والا بھی ( اگرچہ عالم ہو) اپنے رشتہ داروں مثلاً: چچازاد، ماموں زاد، خالہ زاد، پھوپھی زاد سے اپنی بیوی کو پردہ نہیں کراتا، مذکورہ بالا تفصیل کے پیش نظر چند سوالات کا جواب مطلوب ہے:
1..دورِ پرفتن کے پیش نظر غیر محرم سے بے حجاب بات چیت، ہنسی مزاق، ہاتھ ملانا جائز ہے؟
2..اگر مختلف رشتہ دار (دو بھائی، چچا زاد، خالہ زاد وغیرہ) ایک ہی مکان میں رہ رہے ہوں تو ان کے لیے پردہ کی کیا حدود ہیں، نیز عملاً اس کی صورت کیا ہو سکتی ہے؟

جواب…1.. نامحرم عورتوں کے ساتھ گپ شپ لگانا، بے حجاب اختلاط کرنا، ہنسی مزاح کرنا، ہاتھ ملانا جائز نہیں ہے، خواہ قریبی رشتہ دار ہی کیوں نہ ہوں، اہل علم حضرات کو تو اور زیادہ اس فتنہ سے بچنے کی اور اپنے گھر والوں کو بچانے کی کوشش کرنی چاہیے۔
2..ایک مکان میں رہتے ہوئے نامحرم رشتہ داروں سے اہتمام کے ساتھ ”پردے“ کا ماحول بنانا لازم ہے، بلاضرورت ان کے سامنے آنے سے گریز کیا جائے، اور اگر اتفاقی طور پر نامحرم رشتہ دار سامنے آجائے تو عورت کو چاہیے کہ اپنا چہرہ چھپالے او رمرد اپنی نگاہ نیچی کر لے۔

قصر نماز کیا حکم ہے؟
سوال… کیا فرماتے ہیں علمائے کرام مندرجہ ذیل مسائل کے بارے میں :
1..میں جس کمپنی میں کام کرتا ہوں وہاں انجینئرز کو ملک کے مختلف شہروں میں جاکر کام کرنا پڑتا ہے، لیکن کچھ افراد ایسے ہیں جنہیں کسی ایک شہر میں مستقل بھیج دیا گیا ہے جیسے کہ مجھے ”سکھر“ بھیجا گیا ہے ، میری فیملی کراچی میں رہتی ہے اور میں سکھر دس سے بارہ دن رہنے کے بعدد و ، چار دن کے لیے کراچی آجاتا ہوں اپنے گھرو الوں کے پاس، سکھر میں کمپنی کی طرف سے مجھے رہنے کے لیے کمرہ دیا گیا ہے جو فیکٹری کی حدود میں ہے، میرا آنے جانے کا یہ سلسلہ چھ ماہ سے جاری ہے اور غالباً اگلے اٹھارہ ماہ تک رہے گا، تو کیا سکھر میں میری نماز قصر ہو گی؟
2..میری طرح دوسرے شہروں سے بھی لوگ سکھر میں کام کرتے ہیں، لیکن ان کے لیے کمپنی کی طرف سے رہائش کا انتظام نہیں ہے، اس لیے تین، چار افراد نے مل کر کرائے کا مکان لیا ہوتا ہے، ان میں سے کچھ افراد ہر چھ روز کے بعد دو دن کے لیے اپنے گھر والوں کے پاس چلے جاتے ہیں، یاد رہے کہ کسی کے بھی گھر والے سکھر میں نہیں ہیں اور وہ لوگ کئی سالوں سے ایسے ہی رہ رہے ہیں، تو کیا انہیں بھی نماز قصر کرنی ہو گی یا نہیں؟

سوال نمبر1.. اور نمبر2.. دونوں میں اگر کبھی قیام قصداً پندرہ دن یا اس سے زائد کا ہو جائے تو کیا آئندہ ہمیشہ پوری نماز پڑھنی ہو گی یا پھر ہر بار قصر کے ایام شروع سے گنے جائیں گے؟

جواب..1 ، 2.. صورت مسئولہ میں چوں کہ آپ نے سکھر میں پندرہ دن یا اس سے زیادہ دنوں کے لیے قیام نہیں کیا، بلکہ دس بارہ دن بعد کراچی واپس آگئے، اسی طرح باقی ملازمین بھی ہر چھ دن بعد اپنے گھروں کو لوٹ جاتے ہیں، اس لیے آپ حضرات سکھر میں مسافر شمار ہوں گے اور قصر نماز پڑھیں گے، لیکن جماعت کے ساتھ شریک ہو کر پوری نماز پڑھنے کی کوشش کریں تو زیادہ مناسب ہے۔
3..سکھر میں پندرہ دن یا اس سے زیادہ قیام کرنے کے بعد آئندہ کے لیے آپ حضرات سکھر میں مقیم شمار ہوں گے اور پوری نماز پڑھیں گے، جب تک ملازمت کے سلسلے میں وہاں رہیں گے۔

چندہ کی رقم سے طلبہ کو انعامات دینا
سوال… کیا فرماتے ہیں مفتیان کرام کہ آج کل جو مدارس میں سالانہ جلسہ ہوتا ہے او راس میں طلباء کو بطور انعام کتابیں دی جاتی ہیں، اسی طرح علماء کی آمد ورفت پر خرچ شدہ رقم وغیرہ یہ مدرسہ کے چندہ سے خرچ کرنا کیسا ہے؟

جواب…اگر چندہ دینے والوں نے چندہ دیتے وقت مصرف کی تعیین کر دی ہے ، تو اسی مصرف پر چندہ صرف کیا جائے گا اس کے خلاف نہیں، اور اگر مصرف کی تعیین نہیں کی بلکہ مہتمم کو مصالح مدرسہ میں صرف کرنے کا مکمل اختیار دیا ہے تو پھر یہ چندہ کی رقم مدرسہ کی ہر مصلحت میں خرچ کی جاسکتی ہے ، صورت مسئولہ میں چوں کہ انعامی جلسہ منعقد کرنا بھی مصالح مدرسہ میں داخل ہے، لہٰذا اس جلسے پر آنے والے اخراجات چندہ کی رقم سے پورے کیے جاسکتے ہیں ، البتہ غیر ضروری اخراجات (جو مصالح مدرسہ سے متعلق نہ ہوں ) چندہ سے پورے کرنا جائز نہیں، لہٰذا چندہ کی رقم سے جس طرح طلبہ کو وظیفہ دینا درست ہے اسی طرح طلبہ کو امتحان میں کامیابی کے موقع پر انعامات دینا بھی درست ہے، اور باہر کے علمائے کرام مہمانوں کی آمد کی وجہ سے جلسے میں لوگوں کی شرکت اور پھر مدرسے کے ساتھ مالی تعاون زیادہ ہوتا ہے، اس لیے ان کی آمدورفت کے اخراجات بھی چندہ کی رقم سے پورے کیے جاسکتے ہیں۔

کیا وکیل اپنے مؤکل کی اجازت کے بغیر کمیشن لے سکتا ہے؟
سوال… کیا فرماتے ہیں مفتیان کرام مسئلہ ہذا کے بارے میں کہ زید کے بازار میں تعلقات ہیں، جس کی بناء پر اس کو سودا سلف بہت زیادہ سستے داموں مل جاتا ہے، اس بناء پر اکثر لوگ اسے سامان لانے کا کہتے رہتے ہیں، بار بار کے ان کاموں کی وجہ سے اس کے وقت کا کافی حرج ہو جاتا ہے، وہ تعلقات، رشتہ داری اور حیاء کی وجہ سے ان سے اجرت کا مطالبہ بھی نہیں کر سکتا ، اب ایسی کیا صورت ہو سکتی ہے کہ زید کو اس کی محنت یا وقت کا معقول بدل بھی مل جائے اور مؤکلین کو بھی معلوم نہ ہو سکے اوران کا مقصود یعنی اشیاء کا سستے داموں ملنا بھی پورا ہو سکے؟

خالد نے زید کو تین طریقے بتائے کہ ان میں سے کوئی ایک طریقہ اختیار کر لو تمہارے لیے نفع لینا جائز ہو جائے گا:

طریقہ نمبر1  زید کا کوئی دوست یا بھائی وہ چیز مکمل نفع پر خرید لے، مثلاً: ساٹھ روپے میں ، پھر زید اس سے نوّے روپے میں خریدلے اور اپنے مؤکل کو بھی نوّے روپے میں ہی دے دے، اب اگر اس کا مؤکل اپنے طور پر خریدتا تو اسے سو روپے میں ملتی، لیکن زید کے واسطے سے اسے نوّے روپے میں مل گئی، وہ اس پر بھی خوش ہے، دوسری طرف زید کا دوست اپنی مرضی سے کبھی دس روپے، کبھی بیس روپے او رکبھی تیس روپے دے دیتا ہے اور کبھی بالکل بھی نہیں دیتا۔

طریقہ نمبر2  زید نے دوکان دار سے بات کی کہ میں تمہارے لیے گاہک تلاش کرکے لاؤں گا، یا تم سے سامان خریدا کر وں گا، تم مجھے کمیشن دیا کرو، وہاں جو چیز پہلے تم مجھے ساٹھ روپے کی دیتے تھے اب وہ نوّے روپے میں دے دیا کرو۔ چنا ں چہ زید نوّے روپے میں وہ چیز خرید کر نوّے روپے میں ہی اپنے مؤکل کو دے دیتا ہے اور دوکان دار سے اپنا کمیشن لے لیتا ہے۔

طریقہ نمبر3 جب کوئی شخص زید کو کہتا ہے کہ مجھے فلاں چیز لے دو، تو زید کہتا ہے کہ اس وقت تو میں مصروف ہوں، فارغ نہیں ہوں اور دوکان دار بھی نہیں ہو گا، ایسا کرو کہ میں فارغ ہوتے ہی پہلی فرصت میں وہ چیز خرید لوں گا، یا لے لوں گا، آپ مجھ سے لے لینا، پھر زید وہ چیز اپنے لیے ساٹھ روپے میں لے لیتا ہے اور نوّے میں اس کہنے والے پر بیچ دیتا ہے، واضح رہے کہ مؤکل زید کے ان الفاظ کے ہیر پھیر سے بالکل ناواقف ہے، وہ یہی سمجھ رہا ہے کہ زید مجھے دوکان دار سے لے کر دے گا اور جتنے میں مجھے دے رہا ہے اتنے میں ہی اس نے خریدی ہے، یعنی: اس کے گمان میں زید اپنے لیے نفع نہیں رکھ رہا، اگر چہ زید اپنے گمان میں اپنے الفاظ کے استعمال سے وکالت کے بجائے بیع وشراء کر رہا ہے۔

اب آپ حضرات بتائیں کہ:
مذکورہ تینوں طریقے درست ہیں؟ یا کوئی ایک؟ یا کوئی بھی نہیں؟ بالخصوص تیسری صورت کے بارے میں وضاحت فرما دیں، بہرصورت اگر شرعاً کوئی گنجائش ملتی ہو تو مطلع فرمائیں۔

جواب… صورتِ مسئولہ میں تینوں صورتیں جائز نہیں، کیوں کہ پہلی اور تیسری صورت میں زید کا اپنے موکل کے ساتھ خیانت کرنا اور اس کو دھوکہ دینا پایا جاتا ہے اور دوسری صورت میں اصل عاقد ( مشتری) خود زید ہی ہے اس لیے اس کے لیے بائع سے کمیشن لینے کی شرط لگانا شرطِ فاسد ہے جو جائز نہیں ہے، البتہ جواز کی صورت یہ ہے کہ زید اپنے مؤکلین سے اجرت طے کر لے۔

ناخن ، بال کٹوانے ، تیل وخوشبو لگانے کا مسنون طریقہ
سوال… ناخن کٹوانے، سر کے بال کٹوانے اور تیل وخوشبو لگانے کا مسنون طریقہ کیا ہے؟ باحوالہ جواب مرحمت فرمائیں۔

جواب…1..ناخن کاٹتے وقت انگلیوں کی ترتیب کسی حدیث سے صراحتاً ثابت نہیں، البتہ فقہاء نے بہتر طریقہ یہ لکھا ہے کہ دائیں ہاتھ کی شہادت والی انگلی سے شروع کرے اور ترتیب وار چھوٹی انگلی تک کاٹے ، پھر بائیں ہاتھ کی چھوٹی انگلی سے لے کر انگوٹھے تک بالترتیب کاٹے، آخر میں دائیں ہاتھ کے انگوٹھے کا ناخن کاٹے اور پیروں کے ناخن کاٹنے کا بہتر طریقہ یہ ہے کہ دائیں پیر کی چھوٹی انگلی سے ابتدا کرے اور بالترتیب بائیں پیر کی چھوٹی انگلی تک کاٹے۔

2..سر کے بال کٹوانے کا مسنون طریقہ یہ ہے کہ سر کے دائیں جانب سے ابتدا کی جائے اور پورے سر کے بالوں کو منڈوایا جائے یا کتروایا جائے ، سر کے بعض حصہ کے بالوں کو کتروانا اور بعض کو چھوڑنا، اسی طرح کچھ بال کم او رکچھ زیادہ کتروانا درست نہیں ہے۔

3..تیل لگانے کا بہتر طریقہ یہ ہے کہ بائیں ہاتھ کی ہتھیلی میں ڈال کر بھنؤوں سے ابتدا کرے، پھر آنکھوں ( کے پپوٹوں)پر اور پھر سر پر لگائیں۔

4..خوشبو لگانے کا کوئی خاص طریقہ تو روایات میں نہ مل سکا، البتہ سر مبارک، چہرہ مبارک ، داڑھی مبارک اور ہاتھوں پر خوشبو لگانا روایات سے ثابت ہے، بہرحال جسم پر کہیں بھی لگانے سے سنت پر عمل ہو جائے گا۔

http://www.farooqia.com/ur/lib/1437/04/p31.php

جدید فقہی مسائل

موبائل میں غلطی سے بیلنس آجائے
سوال:- اگر ہمارے موبائل فون میں کسی کا غلطی سے بیلنس آجائے اور کسی بھی طرح سے نہ مالک معلوم ہوسکتا ہے نہ ہی اسے لوٹا ناممکن ہے ، تو اس صورت حال کے متعلق شریعت کا کیا حکم ہے ؟ 
(محمد امام الدین ، سعیدآباد)
جواب :- اگر کسی کا بیلنس غلطی سے آپ کے فون میں آجائے تو اس کی حیثیت ’ لقطہ ‘ یعنی ایسے گرے پڑے مال کی ہے ، جو کسی دیکھنے والے شخص کو مل جاتا ہے ، اس کا حکم یہ ہے کہ اگر مالک تک پہنچانا ممکن ہو تو پہنچائے ، ورنہ صدقہ کردے ، جو شخص مالدار ہو ، اس کے لئے اس کی گنجائش نہیں ہے کہ وہ خود اس سے فائدہ اُٹھائے : ’’ ثم اذا عرفھا ولم یحضر صاحبھا مدۃ التعریف فھو بالخیار إن شاء أمسکھا إلی أن یحضر صاحبھا وإن شاء تصدق بھا علی الفقراء ولو أراد أن ینتفع بھا فإن کان غنیا لا یجوز ان ینتفع بھا عندنا‘‘ (بدائع الصنائع : ۵؍۲۹۸) لہٰذا چوںکہ مالک کا پتہ نہیں ہے اور اسے لوٹایا نہیں جاسکتا ؛ اس لئے آپ اتنی رقم صدقہ کردیں ۔ 
موبائیل میں نیٹ کا ریچارج
سوال:- موبائیل کے نیٹ کا ریچارج کرنا کیسا ہے ؟( سمیع الدین ، نلگنڈہ)
جواب :- نیٹ کا استعمال چوںکہ جائز مقاصد کے لئے بھی ہوسکتا ہے ؛ اس لئے بہتر نیت سے نیٹ کا ریچارج کرنا جائز ہے ؛ کیوںکہ شریعت کا اُصول ہے کہ جس چیز کا استعمال جائز و ناجائز دونوں مقاصد کے لئے ہوسکتا ہو ، اس میں نیت اور مقصد کا اعتبار ہے : ’’ الامور بمقاصدھا‘‘ ۔
پرانے اور نئے سکہ کا تبادلہ
سوال:- پرانے سکے اور پھٹی پرانی نوٹ کی کم یا زیادہ قیمت کرکے تجارت کرنا کیسا ہے ؟ 
(عارف احمد بھائی پین والا ، سورت )
جواب :- جب روپیہ کا تبادلہ روپیہ سے ہو تو ضروری ہے کہ دونوں طرف سے برابر ہو ، چاہے ایک طرف کی نوٹ نئی ہو اور دوسرے طرف کی پرانی : ’’ وجیدہ وردیئہ سواء حتی لا یصح بیع الجید بالردیٔ مما فیہ الربا إلا مثلا بمثل ‘‘ ( ہندیہ : ۳؍ ۱۱۷) اس لئے اس طرح تجارت کرنا جائز نہیں ؛ البتہ اگر کوئی شخص پرانی نوٹ لے کر بینک سے اس کو بدلتا ہو ، اس کام کو انجام دینے کے لئے اس کا وقت صرف ہوتا ہو ، پیسہ خرچ ہوتا ہو یا عملہ اور دفتر رکھنا پڑتا ہو تو اس بات کی گنجائش ہے کہ وہ نوٹ کا تو برابری کے ساتھ تبادلہ کرے ؛ لیکن اپنے کام کی اُجرت مقرر کرکے اُجرت وصول کرلے ، مثلاً سو روپے لے کر سو روپے دے ، اور الگ سے دو روپیہ اس کی اُجرت لے ، اُمید ہے کہ اس کی گنجائش ہوگی ؛ کیوںکہ یہ دو روپیہ تجارت کے نفع کے طورپر نہیں ہے ، اُجرت کے طورپر ہے ۔
تعویذ جائز ہے مگر بعض شرطوں کے ساتھ!
سوال:- آج کل لوگ تعویذات کے چکر میں پڑے ہوئے ہیں تو اس میں شریعت کا کیا حکم ہے ؟ 
(حافظ عبد الماجد عابد ، پاولہ گھر)
جواب :- جو حکم جھاڑ پھونک کا ہے ، وہی تعویذ کا ہے ، جھاڑ پھونک میں زبان سے دُعا کرکے مریض پر دم کیا جاتا ہے اور تعویذ میں اسی دُعا کو لکھ دیا جاتا ہے ، رسول اللہ ا نے جھاڑ پھونک کی اجازت دی ہے ؛ بشرطیکہ اس میں کوئی مشرکانہ بات نہ ہو : ’’ لا باس بالتعویذ مالم یکن فیہ شرک‘‘ (مسلم عن عوف بن مالک اشجعی : ۲؍۲۲۴ ، باب الطب) — ملا علی قاری نے مرقاۃ شرح مشکوٰۃ ( ۸؍۳۵۰ – ۳۵۹)اور امام نووی نے مسلم کی شرح (باب الطب : ۲؍۲۱۹ ، ط : ہند) میں اس پر تفصیل سے گفتگو کی ہے ، حافظ ابن حجر نے ان مباحث کو سمیٹتے ہوئے ذکر کیا ہے کہ تین شرطوں کے ساتھ جھاڑ پھونک کرنا جائز ہے ، ایک یہ کہ اللہ تعالیٰ کے کلام یا اسماء و صفات کے ذریعہ جھاڑ پھونک کیا جائے ، دوسرے : اس کا مفہوم سمجھ میں آتا ہو ، تیسرے : یقین اللہ تعالیٰ پر ہو ، دل میں یہ خیال نہ جم جائے کہ اسی جھاڑ پھونک کے ذریعہ صحت حاصل ہوگی ، ( فتح الباری : ۱۰؍۲۴۰) قرآنی آیات ہی کی طرح دُعاؤں کے ذریعہ بھی جھاڑ پھونک جائز ہے ، (ردالمحتار : ۹؍۵۲۳) — جو شرائط جھاڑ پھونک کے جائز ہونے کے لئے ہیں ، وہی شرطیں تعویذ کے لئے بھی ہیں ، فقہاء نے اس کے جائز ہونے کی صراحت کی ہے : ’’ لا بأس بتعلیق التعویذ ولکن ینزعہ عندا الخلاء والقربان ‘‘ ۔ (الہندیہ : ۵؍۳۵۶)
مسلمان تاجر اور دیوالی آفر
سوال:- خاص کر تہوار کے تعلق سے آفر رکھنا یعنی غیروں کے تہوار کا نام لے کر جیساکہ دیوالی آفر ، کیا اس طرح بیوپار کرسکتے ہیں ؟ ( مبشر یونس ، سعید آباد)
جواب :- غیر مسلم بھائیوں کے تہوار میں اس طرح شریک ہونا جائز نہیں ہے کہ مشرکانہ فعل میں آپ کی شرکت ہو ؛ لیکن اگر یہ نوعیت نہ ہو تو پھر یہ ناجائز نہیں ہے ، جیسے دیوالی کی مناسبت سے ہندو بھائی آپ کے یہاں سے کپڑے خریدیں تو ان کے ہاتھ کپڑا فروخت کرنے میں کوئی حرج نہیں ہے ؛ کیوںکہ آپ کی فروخت کی ہوئی شئے سے پوجا کا عمل انجام نہیں دیا جاتا : ’’ وجاز بیع عصیر عنب ممن یعلم أنہ یتخذ خمراً لأن المعصیۃ لا تقوم بعینہ بل بعد تغییرہ ‘‘ (الدر علی الرد : ۶؍۳۹۱)— آفر دینا بھی اسی طرح کی ایک شکل ہے ، اس لئے اس کی گنجائش ہے ؛ البتہ بہتر ہے کہ آپ اسے ’ دیوالی آفر ‘ نام دینے کے بجائے یوں کہیں کہ فلاں تاریخ سے فلاں تاریخ تک آفر ہے اور یہ وہی تاریخیں ہوں ، جن میں دیوالی کی خریداری ہوتی ہو ۔
منی ٹرانسفر
سوال:- ایک شخص منی ٹرانسفر کا کاروبار کرتا ہے اور ہر سو روپئے پر پانچ روپے لیتا ہے ، اوربسااوقات زیادہ رقم لگانے پر کچھ رقم کم بھی کردیتا ہے ، بینک تو محدود وقت میں ہی کام کرتا ہے ؛ لیکن اس میں کسی بھی وقت کام لیا جاسکتا ہے ، فرق صرف یہ ہے کہ بینک ایک متعینہ رقم وصول کرتا ہے ، خواہ کتنی ہی رقم بھیجی جائے ، جب کہ منی ٹرانسفر کرنے والا ہر سینکڑے یا ہزار پر رقم وصول کرتا ہے ، تو کیا ان کا یہ کاروبار کرنا جائز ہے ؟ ( محمد نسیم ، لدھیانہ ، پنجاب)
جواب :- منی ٹرانسفر کی یہ صورت باہم رقم کی تبادلہ نہیں ہے ؛ بلکہ رقم پہنچانے اور اس کی اُجرت وصول کرنے کی ہے ، ایک خاص رقم بھی متعین کی جاسکتی ہے اور یہ صورت زیادہ بہتر ہے ، تاہم فقہاء متأخرین کے تناسب نے بھی اُجرت کی رقم متعین کرنے کی اجازت دی ہے ؛ اس لئے فیصد کے حساب سے بھی اُجرت لینے کی گنجائش ہے ۔
تیل ، عطر ، سرمہ اور کپڑوں کے لئے مسنون طریقہ
سوال:- سر میں تیل لگانے ، سرمہ ، عطر اور کپڑوں کے پہننے کا مسنون طریقہ کیا ہے ؟( محمد مہتاب ، یاقوت پورہ)
جواب :- (الف) حضرت عائشہؓ فرماتی ہیں کہ جب آپ اتیل لگاتے تو اسے بائیں ہاتھ میں رکھتے ، دونوں بھوؤں پر لگاتے ، پھر دونوں آنکھوں پر ، پھر سر پر لگاتے ۔ (شمائل کبریٰ : ۱؍۴۷)
(ب) آپ اسے سرمہ لگانے کے متعلق تین طریقے منقول ہیں :
(۱) دونوں آنکھوں میں تین تین سلائی لگاتے ، اس طریقہ کا ذکر حضرت عبد اللہ بن عباس ؓ کی روایت میں ہے ۔ (شمائل ترمذی :۵)
(۲) دائیں میں تین اور بائیں میں دو سلائی فرماتے ۔ ( شمائل کبریٰ : ۱؍۴۴۲، بحوالہ : مجمع الزوائد : ۵؍۹۹)
(۳) دونوں آنکھوں میں دو دو سلائی لگاتے ، پھر ایک سلائی دونوں آنکھوں میں مشترک ۔ (شمائل کبریٰ : ۱؍۴۴۳، بحوالہ : شعب الایمان : ۵؍۲۱۹)
(ج ) آپ ا سر کے علاوہ داڑھی اور مانگ میں بھی عمر لگاتے تھے ، ( شمائل کبریٰ : ۱؍۵۷۳ ) حضرت عائشہ ؓکی روایت میں رسول اللہ ا کی مانگ میں عطر رکھنے کا ذکر ہے : ’’ کانی أنظر الی وبیض الطیب فی مفارق رسول اﷲ صلی اﷲ علیہ وسلم وھو محرم‘‘۔(بخاری : ۱؍۲۰۸)
(د) آپ اجب کپڑا پہنتے تو دائیں جانب سے شروع فرماتے تھے : ’’ کان رسول اﷲ صلی اﷲ علیہ وسلم اذا لبس قمیصاً بدأ بمیا منہ‘‘ ۔ (سنن ترمذی ، حدیث نمبر : ۱۷۶۶)
مولانا خالد سیف اﷲ رحمانی

طلاق ثلاثہ بل تضاد پر مبنی

اندازہ ہے کہ ۲۸؍ دسمبر ۲۰۱۸ء کو مرکزی وزیر قانون روی شنکر پرشاد پارلیمنٹ میں وہ بل پیش کردینگے، جس کا تعلق تین طلاق سے ہے ایوان زیریں کے ٹیبل پر رکھے جانیوالے اس بل کا نام دی مسلم ومن (پروٹیکشن آف رائٹس آن مریج) بل ۲۰۱۷ ء ہے اس کا تعلق ایک ساتھ تین طلاق دینے سے ہے — سپریم کورٹ نے ۲۲، اگست ۷۱۰۲ء کو فیصلہ سنادیا تھا کہ اگر شوہر نے تین طلاق ایک ساتھ دیدی تو وہ بے اثر ہوگی ازدواجی زندگی پر اس طلاق کا کوئی اثر نہیں پڑے گا۔ قانونی مثالوں کی روشنی میں اگر اس تین طلاق کو سمجھا جاسکتا ہے تو یہ کہ اس طرح کی بات ایک ”نامناسب“ لفظ تھا، جو زبان سے نکل گیا۔ سپریم کورٹ کے فیصلہ کی روشنی میں ایسی طلاق کی حیثیت اس سے کچھ زیادہ نہیں ہے۔
شرعی لحاظ سے ”طلاق“ کا لفظ میاں بیوی کے رشتہ میں دراڑ ڈالنے والا اور تین دفعہ استعمال ہو تو اس رشتہ کو یکسر ختم کرنیوالا ہے سپریم کورٹ کے اس فیصلہ نے مسلم سماج کےلئے بڑی مشکل پیدا کردی، کورٹ کے فیصلہ کے لحاظ سے ایک اور دو طلاق تو نتیجہ خیز ہے مگر تین طلاق بے اثر ہے جبکہ شرعی لحاظ سے تین طلاق کے بعد شوہر اور بیوی کا رشتہ فوراً ختم ہوجاتا ہے اور دونوں کا ساتھ زندگی گذارنا حرام ہے، مسلم سماج اس مرحلہ میں بڑی مشکل میں پڑجائیگا، مسلمانوں کےلئے حلال اور حرام کی سرحدیں واضح ہیں۔ سپریم کورٹ کا فیصلہ اپنی جگہ، مگر تین طلاق کے بعد سابق میاں بیوی ساتھ رہے تو شریعت کے لحاظ سے وہ بالکل غلط اور حرام ہے، کورٹ نے یہ بالکل نہیں سونچا کہ ایسا فیصلہ مسلمانوں کو کتنی الجھن اور کیسے تضاد میں ڈالدے گا۔
اب مرکزی وزیر قانون نے نئے بل کے ذریعہ یہ اضافہ کیا کہ سپریم کورٹ کے کالعدم اور بے اثر طلاق کو کریمنل اقدام مان لیا، انہیں سونچنا چاہئے تھا کہ بے اثر لفظ کی تکرار کوئی کریمنل اقدام کیسے ہوجائیگا۔ اس بل کو لانیکی ضرورت کیوں پڑی؟ اسکی وضاحت کرتے ہوئے کہا گیا، کہ سپریم کورٹ کے فیصلہ کے باوجود لوگ تین طلاق دینے سے باز نہیں آرہے تھے اور ایک ساتھ تین طلاق کے بہتر (۲۷) کیس ریکارڈ کئے گئے اس لئے سخت قانون کی ضرورت پڑی، پہلا سوال تو یہ ہے کہ جب سپریم کورٹ کے فیصلہ کے پیش نظر طلاق دینے کا کوئی اثر ہوا ہی نہیں، تو پھر تین طلاق کو سخت قانون سے روکنے کا کیا مطلب ہے؟ دوسری بات یہ ہے کہ تازہ بل میں تین طلاق دینے والے تین سال کی سزا کے مستحق قرار دیئے گئے ہیں، اور بیوی بچوں کی کفالت بھی طلاق دینے والے کے ذمہ ہوگی، اب اگر تین طلاق کے بعد عورت نے مجسٹریٹ کا دروازہ کھٹکھٹایا، اور طلاق دینے والا تین سال کےلئے جیل چلاگیا، تو اس عورت اور بچوں کا کھانا خرچہ اور تعلیمی کفالت مرد جیل میں رہ کر کس آمدنی سے کرسکے گا۔ تیسری بات یہ ہے کہ جب مرد تین سال جیل میں زندگی گذارکر باہر آئیگا، تو وہ عورت اس وقت بھی اس کی بیوی رہیگی، (جیساکہ سپریم کورٹ کا فیصلہ ہے مگر موجودہ بل میں اس معاملہ پر خاموشی ہے) ایسی صورتحال میں جس عورت نے مرد کو تین سال جیل کی ہوا کھلائی اسے بیوی کی حیثیت سے ساتھ رکھنا کیا عملاً ممکن ہوگا۔
بل کا یہ پہلو بھی قابل توجہ ہے کہ یہ کریمنل ایکٹ بننے والا ہے، جبکہ نکاح معاہدہ اور سول معاملہ ہے، سول معاملہ کو کریمنل بنادینا خود قانون دانوں کی واضح رائے کے خلاف ہے، ۶۰۰۲ءمیں سپریم کورٹ کے ججوں مسٹر ایچ کے سیما اور مسٹر آر وی رویندرن نے فیصلہ دیا تھا کہ سول معاملات کو کریمنل بنادینا صحیح نہیں ہے، ایسی کسی بھی کوشش کو بہتر نہیں کہا جاسکتا یہ طریقہ کار انصاف کے تقاضوں کے خلاف ہے، جسکی حوصلہ شکنی ضروری ہے۔
جب سپریم کورٹ نے ایک ساتھ تین طلاق کو بے اثر بنادیا ہے تو بیوی کے لئے پھر اس میں نہ علیحدگی کا معاملہ ہے اور نہ کوئی بُری بات، اسے تشدد آمیز جملہ بھی نہیں کہا جاسکتا اور نہ اسے گالی کے درجہ میں رکھا جاسکتا ہے، اگر مرکزی حکومت اسے گالی سمجھتی ہے تو اس کے لئے بھی قانون موجود ہے، اگر کسی حساس خاتون کو اس کی وجہ سے ذہنی ایذا رسانی ہوتی ہے تو شوہر کی طرف سے ذہنی یا جسمانی ایذا رسانی کے لئے ڈومیسٹک وائلنس ایکٹ ۵۰۰۲ موجود ہے، عورت مجسٹریٹ تک معاملہ پہنچاسکتی ہے، وہاں سے ایذارسانی کا علاج نکلے گا، یہ پورا معاملہ بھی سول پروسیجیور کا ہے کریمنل کا نہیں ہے، پھر یہ کہاں تک قانوناً درست ہوگا، کہ جس چیز کو عدالت عالیہ بے اثر قرار دے چکی ہے، اس پر ایکبارگی بلا سبب کریمنل قانون بنادیا جائے جبکہ قانون سازی کی تاریخ یہ ہے کہ ذہنی یا جسمانی تشدد کو پہلے سول معاملہ کے درجہ میں رکھا جاتا ہے۔
اس معاملہ کو قانون شہادت کی روشنی میں بھی دیکھا جانا چاہئے — عام طور پر تین طلاق بیوی کو کسی ناراضگی یا جھگڑے کے موقع پر دیجاتی ہے، جہاں اکثر و بیشتر مواقع پر میاں بیوی ہی ہوتے ہیں، خاندان یا محلہ کے لوگ کبھی کبھار ہی جمع ہوجاتے ہیں۔ اب اگر بیوی مجسٹریٹ کے یہاں تین طلاق کا دعویٰ کرے، تو قانون شہادت کی رو سے گواہ کہاں ملیں گے؟ کون خاندان والا اپنے عزیز کو تین سال کی جیل بھیجنے کی گواہی دیگا؟ اور اگر طلاق کے وقت صرف میاں بیوی تھے تو گواہی کا معاملہ اور بھی مشکل ہے۔
جن لوگوں کے سامنے گھریلو جھگڑوں یا میاں بیوی کی تلخیوں کے واقعات آتے رہتے ہیں، وہ شہادت دے سکتے ہیں کہ اچھی خاصی تعداد میں ایسی عورتیں بھی ہوتی ہیں جو شوہر کی بدمزاجی، سخت گیری یا مزاج نہ ملنے کی وجہ سے شوہر سے پہلی فرصت میں گلوخلاصی چاہتی ہیں، اور وہ خود مطالبہ کرتی ہیں کہ انہیں فوراً تین طلاق دیکر چھٹکارہ دیدیا جائے۔ اور سمجھانے سے شوہر بھی شرطوں کے ساتھ یا بلا شر ط تین طلاق دینے کو تیار ہوجاتا ہے — مگر اس بل کے ایکٹ بننے کے بعد کوئی مرد مذکورہ شکل میں بیوی کو علیٰحدہ کرنیکی ہمت کرے گا؟ یہ سمجھنا کہ تین طلاق مرد ہمیشہ یک طرفہ دیتا ہے، سماجی حالات کو نہ جاننے کی وجہ سے ہے، جن لوگوں کو دارالافتاءاور دارالقضاءکے کاموں کا تجربہ ہے وہ اچھی طرح جانتے ہیں کہ طلاق عورت کے اصرار پر بھی مردوں کو دینی پڑتی ہے۔
سیاسی مقاصد کی تکمیل کےلئے عجلت میں لایا گیا یہ بل ان لوگوں نے تیار کیا ہے جنھیں مسلم سماج کے انداز و مزاج، مسائل و مشکلات، سہولتوں اور دشواریوں کا اندازہ نہیں ہے، انہیں ایک کریمنل لا بنانا تھا، یہی سرکار والا تبار کا آدیش تھا، انھوں نے سخت قسم کا قانون ڈرافٹ کردیا، انھوں نے یہ بھی نہیں سوچا کہ دستور کے آرٹیکل ۴۱-۵۱ کی خلاف ورزی ہوگی، جب تین طلاق بے اثر ہے، تو پھر جیل کی سزا کیوں؟ انہوں نے یہ بھی نہیں سوچا کہ جب دوسرے مذہب کے ماننے والوں کےلئے بیوی کو چھوڑدینے کی سزا ایک سال ہے، تو مسلمانوں کو نہ چھوڑنے پر تین سال کی سزا کیوں کر دیجاسکتی ہے؟ کیا یہ قانون سازی میں مذہب کی بنیاد پر تفریق نہیں ہے اور کیا یہ آئین کے مطابق ہے؟
قانون سازوں کو یہ بھی نہیں بھولنا چاہئے کہ اس ملک میں مردم شماری رپورٹ کے مطابق بتیس لاکھ عورتیں وہ ہیں جنہیں سات پھیرے کے کچھ دنوں بعد شوہروں نے چھوڑ دیا ہے اور وہ کسمپرسی کی زندگی گذاررہی ہیں، ان کی زندگی گذار نے کا کوئی نظم ہونا چاہئے، ان کے شوہروں نے انہیں چھوڑ رکھا ہے وہ بھی غلط کار ہیں، ان کے لئے بھی سزا ہونی چاہئے۔
یہ بل اپنے اندر کئی تضاد رکھتا ہے، اور سپریم کورٹ کی منشا کے بھی خلاف ہے، اس پر غور و فکر کی ضرورت ہے اور اسے اسٹینڈنگ کمیٹی کے حوالہ کرنا چاہئے، یا پھر راجیہ سبھا اسے سلیکٹ کمیٹی کے حوالہ کرے جہاں تمام گوشوں پر غور کیا جاسکے، دانشوروں، علماء کرام سے بھی مشورہ لیکر اسکی خامیوں کو دور کیا جائے —- ورنہ موجودہ صورتحال میں کئی اہم سوالات ہیں جو سپریم کورٹ کے فیصلہ اور پیش کردہ بل کے نتیجہ میں بھی ابھر کر سامنے آتے ہیں، جن پر پارلیمنٹ کے اندر بحث ہونی چاہئے، اور علماء اور دانشوروں کو بھی اپنی رائے دینی چاہئے۔
مولانا محمد ولی رحمانی
.......
ہمارا جن لوگوں سے سامنا ہے، 
وہ مسلمانوں اور 
اسلام کی شناخت کے خلاف ہیں، 

آج صبح 9 بجے سے ہی مختلف چینلز پر بحث میں شریک ہوں، سنگھ، بھاجپا والے بغیر سوالات کے جوابات دیے، باتیں کر رہے ہیں، وہ مسئلے کو حل نہیں کرنا چاہتے ہیں بلکہ شرعی احکام کو بے اثر قرار دے کر اسلامی شریعت اور مسلمانوں کی شناخت کو ختم کرنا چاہتے ہیں، وہ بل کو اپنی پسند کے مطابق ہی پاس کروائیں گے، اتنا لکھ کر جب ڈیبیٹ کے لئے چینل اسٹؤڈیو میں گیا تو جس خدشہ اور اندازہ پہلے سے تھا وہی ہوا کہ اقتداری پارٹی نے تمام تر اصلاحات کو مسترد کرتے ہوئے بل کو معلوم منظوری دے دی، سنگھ، ہندوتو وادیوں کا پہلے سے ہی پروگرام ہے کہ مسلمانوں کو حرام میں مبتلا کیا جائے اور حلال کو عمل میں نہ رہنے دیا جائے، مزید یہ کہ ان کی کوئی مذہبی وتہزیبی شناخت نہ ہو، ہندؤں میں حلال و حرام کا سرے سے کوئی تصور نہیں ہے، صرف قانونی غیر قانونی کا مسئلہ ہے، مسلم نام والے، بل کی حمایت کرنے والے مرد اور عورت کا بھی یہی معاملہ ہے، ہمارا برسوں سے یہ نظریہ ہے کہ ہندوتو وادی طاقتوں کا ہر سطح پر مقابلہ کیا جائے، اگر ہم صحیح مزاحمت کرتے تو یہ صورت حال پیدا نہ ہوتی، جمعیتہ علماء ہند  میں رہتے ہوئے بھی ہمارا یہی طرز فکر و عمل تھا، لیکن وہاں بھی کچھ لوگوں نے سمجھنے کی کوشش نہیں کی، اگر اب بھی  ہم نےمزاحمت کے صحیح طریقے. نہیں اختیار. نہیں کریں گے تو آنے والے دنوں میں اور زیادہ بد ترین حالات کا سامنا کرنا پڑے گا، 28/12/2017
https://www.facebook.com/abdulhameed.noumani/posts/1581855068573626

....
بندروں نے مچھلیوں پر رحم کھا کے پانی سے بچانے والا بل پاس کردیا۔ اب پانی سے نکال کر انھیں دھوپ دکھائینگے تاکہ سرد موسم میں انھیں سردی نہ لگ جائے اور کوئی مچھلی پانی میں ڈوب کر مرنہ جائے!
....
زکوة نہ دینے والے کو قیامت کے دن "گنجا سانپ" (شجاع اقرع) کا طوق بن کے ڈسنا پڑھا اور پڑھایا تھا۔
جبکہ آج پارلیمنٹ میں اس "گنجا سانپ" (ایم جے اخبث) کو پورے مسلمانوں کو ڈستا دیکھ کے یقین ہوگیا کہ پورے گلستاں کی فضاء کو زہر آلود کرڈالنے کے لئے یہ "بے دال کا بودم" گنجا اکیلا ہی کافی ہے۔
ابو اسامہ

तीन तलाक़ बिल; कौन हैं गुलअफ्शां?

कौन हैं गुलअफ्शां जिनका नाम रविशंकर प्रसाद ने लोकसभा में लिया?
केंद्र सरकार ने लोकसभा में एक बार में तीन तलाक़ बिल पेश किया और गुरुवार को दिनभर चली बहस के बाद आख़िरकार ये लोकसभा में पास हो गया.
बिल के ख़िलाफ़ विपक्षी सांसद कई संशोधन लेकर आए, लेकिन संख्याबल के आगे ये सभी संशोधन ख़ारिज हो गए. लोकसभा के बाद अब ये बिल राज्यसभा में मंज़ूरी के लिए जाएगा.
बिल पेश करने के दौरान क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि यह मामला महिलाओं की गरिमा से जुड़ा हुआ है.
मसौदा पेश करने के दौरान रविशंकर प्रसाद ने एक मामले का ज़िक्र भी किया.
उन्होंने कहा, "आज सुबह मैंने पढ़ा रामपुर की एक महिला को तीन तलाक़ इसलिए दिया गया क्योंकि वो सुबह देर से उठी थी."
बीबीसी ने उस महिला से बात की और पूरा मामला जानने की कोशिश की.
कौन है वो महिला?
उत्तर प्रदेश के रामपुर की रहने वाली गुलअफ़्शा का नाम संसद में भी गूंजा. क़ानून मंत्री ने उनके मामले का हवाला देते हुए मुस्लिम महिलाओं की स्थिति को बयां करने की कोशिश की.
गुलअफ़्शां रामपुर ज़िले की तहसील सदर के नगलिया आकिल गांव में रहती हैं.
गुलअफ्शां और कासिम का घर एक-दूसरे से चंद क़दमों की दूरी पर है. दोनों एक-दूसरे को सालों से जानते थे. जान-पहचान प्यार में बदली और सात महीने पहले दोनों ने शादी कर ली.
गुलअफ्शां के पति कासिम ड्राइवर हैं.
गुलअफ्शां ने हमें बताया, "रविवार की रात को मेरे पति कासिम ने मेरे साथ बहुत मारपीट की थी. मारपीट के चलते मेरी तबियत बिगड़ गई थी और अगली सुबह इसी वजह से मैं थोड़ा देर से उठी."
देर मतलब…?
"मैं थोड़ा देर से सुबह साढ़े आठ बजे सोकर उठी. दरवाज़े के बाहर क़दम रखा और उसके बाद उन्होंने तीन बार तलाक़-तलाक़-तलाक़ कह दिया."
गुलअफ्शां आगे कहती हैं, "जब तक मैं समझ पाती वो तलाक़-तलाक़-तलाक़ कह चुके थे."
"मैंने उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन वो मेरी एक सुनने को राज़ी नहीं थे. एक ही ज़िद्द ठान रखी थी कि अब मुझे नहीं रखना है."
गुलअफ्शां बताती हैं कि कासिम शादी से पहले भी इस तरह की उल-जुलूल हरकतें किया करते थे. फ़ोन कर देते थे कि घर के बाहर आओ वरना मैं ज़हर खा लूंगा. मैं उनकी सुनकर चली जाया करती थी.'
गुलअफ्शां ने बताया, "कासिम की हरकतों से मेरे घर वाले बहुत परेशान हो गए थे. जिसके बाद सात महीने पहले ही उन्होंने हमारा निकाह पढ़वा दिया. हमारी शादी में भी सिर्फ़ 30-35 लोग ही आए थे."
सुबह की तीन तलाक़ की घटना पर गुलअफ्शा कहती हैं कि मेरे ससुराल में तीन लोग और हैं, लेकिन किसी ने कुछ नहीं कहा.
गुलअफ्शां का कहना है कि वो पुलिस के पास भी गई थी और मौखिक शिकायत की थी.
हालांकि बाद में गुलअफ्शां के परिवार वाले इस मामले को लेकर पंचायत पहुंचे और उसके बाद पंचायत ने पति-पत्नी के बीच सुलह करवा दी.
गुलअफ्शां कहती हैं कि अब हमारी सुलह हो गई है, लेकिन हम शरीयत को मानते हैं तो हलाला के बाद मैं अपने पति के पास चली जाऊंगी.
पंचायत में मौजूद एक शख्स ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि पंचायत में दोनों पक्षों को समझाया गया जिसके बाद दोनों परिवार सुलह के लिए राज़ी हो गए.
बीबीसी ने गुलअफ्शां के पति कासिम से भी बात करने की कोशिश की, लेकिन फिलहाल उनसे संपर्क नहीं हो सका. हालांकि कासिम के भाई मिराज ने बीबीसी को फ़ोन पर बताया कि उनके भाई ने भाभी (गुलअफ्शां) को तलाक़ दे दिया था, लेकिन अब पंचायत के हस्तक्षेप के बाद सुलह हो गई है और हलाला के बाद गुलअफ़्शां वापस आ जाएंगी.
भूमिका राय बीबीसी संवाददाता
http://www.bbc.com/hindi/india-42505791
_____
एक बार में तीन तलाक़ बि लोकसभा में पास
एक बार में तीन तलाक़ विधेयक (मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण विधेयक) लोकसभा में गुरुवार को पारित हो गया. लंबी बहस के बाद बिल के ख़िलाफ़ सभी संशोधन खारिज कर दिये गये यानी इसे बिना किसी संशोधन के पास कर दिया गया. अब इसे राज्यसभा में पेश किया जायेगा.
विधेयक पर विपक्षी सदस्य 19 संशोधन प्रस्ताव लेकर आए थे, लेकिन सदन ने सभी को ख़ारिज कर दिया. तीन संशोधनों पर वोटिंग की मांग की गई और वोटिंग होने के बाद स्पीकर सुमित्रा महाजन ने परिणामों की घोषणा करते हुए कहा कि ये ख़ारिज हो गए हैं. इस बिल में तीन साल के जेल का प्रावधान है. बिल के अनुसार अगर कोई तलाक़ देता है तो उसे थाने से नहीं कोर्ट से जमानत नहीं मिलेगी.
इससे पहले, क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने हंगामे के बीच इसे लोकसभा में पेश किया.
इस पर बहस के दौरान उन्होंने कहा, "देश की महिलाएं बहुत पीड़ित हुआ करती थीं. 22 अगस्त 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक बताया था. आज सुबह मैंने पढ़ा रामपुर की एक महिला को तीन तलाक़ इसलिए दिया गया क्योंकि वो सुबह देर से उठी थी."
उन्होंने कहा, "महिलाओं की गरिमा से जुड़ा है तीन तलाक़. सुप्रीम कोर्ट से भी एक बार में तीन तलाक़ को असंवैधानिक बताया जा चुका है. उम्मीद थी कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद देश में स्थितियां बदलेंगी, लेकिन जहां इस साल 300 तीन तलाक़ हुए हैं वहीं सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद भी 100 तीन तलाक़ हुए हैं."
क़ानून मंत्री ने कहा, "इस्लामिक देश बांग्लादेश, मिस्र, मोरक्को, इंडोनेशिया, मलेशिया और पाकिस्तान में भी तीन तलाक़ को रेग्युलेट किया गया है. 1961 में बांग्लादेश में लाया गया था एक कानून. इसके अनुसार पत्नी को तीन तलाक़ लिखित देना होगा. अगर ऐसा नहीं किया तो उसे 1 साल की सज़ा दी जायेगी. 1961 के कानून के अनुसार पाकिस्तान में भी तीन तलाक़ या तलाक़-ए-बिद्दत में पत्नी को लिखित नोटिस देना होगा. अगर नियम न माने तो एक साल कैद और पांच हज़ार रुपये जुर्माना का प्रावधान है."
हम इस मामले को वोट के चश्मे से नहीं देख रहे हैं. सवाल सियासत का नहीं, हम इसे इंसानियत के चश्मे से देख रहे हैं. आरोप परिवार को तोड़ने का लगाया जा रहा है. लेकिन यह सवाल तब क्यों नहीं उठता जब तलाक़ देकर महिला को फुटपाथ पर रहने के लिए मजबूर किया जाता है.
क़ानून मंत्री की चार अपील
रवि शंकर प्रसाद ने कहा, "क्या सदन को खामोश रहना चाहिए? शरिया पर हस्तक्षेप नहीं करना चाहते. यह बिल केवल तीन तलाक़ या तलाक़-ए-बिद्दत पर है. लोकसभा देश की सबसे बड़ी पंचायत से अपील है इस बिल को सियासत की सलाखों से न देखा जाये. दूसरी अपील है कि इसे दलों की दीवार से न बांधा जाये. तीसरी अपील है कि इस बिल को मजहब के तराजू पर न तौला जाये. चौथी अपील है कि इस बिल को वोट बैंक के खाते से न परखा जाये. ये बिल है हमारी बहनों, बेटियों की इज्ज़त आबरू का."
विदेश राज्य मंत्री एम जे अकबरइमेज
विदेश राज्य मंत्री एम जे अकबर
इस्लाम खतरे में नहीं
विदेश राज्य मंत्री एम जे अकबर ने तीन तलाक़ पर बिल लाने को ऐतिहासिक मौका बताया. उन्होंने कहा, "यह ऐतिहासिक इसलिए है क्योंकि देश की 9 करोड़ मुस्लिम महिलाओं की तकदीर से जुड़ा है."
उन्होंने एक किस्सा सुनाया.
एक पत्रकार थीं ताया जिनकिन. अंग्रेज़ी अख़बार द गार्डियन की रिपोर्टर. यह बात 1960-61 की है. उन्होंने जवाहर लाल नेहरू से प्रश्न किया कि आपकी सबसे बड़ी कामयाबी क्या है.
जवाहर लाल ने कहा, "हिंदू कोड बिल."
ताया जिनकिन ने फिर पूछा, "क्या मुसलमान औरतों का हक नहीं था बदलाव का."
जवाहर लाल ने जवाब दिया, "वक्त सही नहीं था."
"मेरे मन में पिछले 40 सालों से यह सवाल है कि वक्त कब सही आयेगा."
"लोगों को यह बताया जाता है कि इस्लाम ख़तरे में है. शरीया को बर्बाद किया जा रहा है. मैं मुसलमान के नाते बोलना चाहता हूं कि जो कलमा पढ़ा है तो वो किस हैसियत से यह कह सकता है कि इस्लाम खतरे में है. लेकिन आपने आज़ादी से पहले देश तोड़ने के लिए इस्तेमाल किया और आज समाज तोड़ने के लिए, ज़हर ये फ़ैलाया जा रहा है. केवल कुछ मुसलमान मर्दों की जबरदस्ती खतरे में है."
"शरीया क्या है? शरीया का असल मायने क़ानून नहीं है. इसका मतलब जरिया या रास्ता है. रास्ता फलसफा था लेकिन कानून बनाने वाले इंसान थे. सुन्नियों में कम से कम शरीया के चार स्कूल हैं. चारों के अपने अपने लोग अलग अलग हैं. एक हैं इमाम अबू हनीफ़ा, दूसरे इमाम मालिकी, तीसरे इमाम शाफ़ई और चौथे इमाम हंबल हैं. चार किस्म के क़ानून हैं. ये कहना कि क़ानून नहीं बदले जा सकते, ग़लत है. कानून को इज्तेहाद की बुनियाद पर तब्दील किया जाना चाहिए."

"कानून लोगों के भले के लिए बनता है. ये क़ानून तलाक़ के ख़िलाफ़ नहीं है, ये केवल तीन तलाक़ के ख़िलाफ़ है."
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा, "सरकार के बिल में कुछ खामियां हैं. हर कोई महिलाओं के अधिकार के पक्ष में है. बिल को संसद की स्थायी समिति को भेजा जाये."

हालांकि सरकार ने इसे ख़ारिज कर दिया. रविशंकर प्रसाद ने कहा कि जो सुझाव है वो संसद में ही दे दें.

असम से सिल्चर से कांग्रेस की सांसद सुष्मिता देव ने क़ानून मंत्री से सवाल पूछा, "अगर आप इसे अपराध बनायेंगे और पति को जेल भेजेंगे तो महिला और उसके बच्चे का का भरण-पोषण कौन करेगा? अगर महिलाओं का ख्याल है तो क्या महिला आरक्षण विधेयक भी सरकार संसद में लाएगी? सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में तीन तलाक़ को प्रतिबंधित कर दिया है. अगर मुस्लिम महिलाओं के उत्थान का विचार है तो मुस्लिम महिलाओं के लिए एक फंड बनाया जाये जो पति के जेल जाने की स्थिति में उसके भरण पोषण के लिए इस्तेमाल किया जाये."
भाजपा सासंद मीनाक्षी लेखी ने कहा, "तलाक़ दुखद प्रक्रिया है जिसका परिणाम औरतों को ताउम्र सताता रहता है."

"क्यों बनाते हैं हम ऐसे रिश्ते जो पल दो पल में टूट जाते हैं, वादा तो करते हैं ताउम्र साथ निभाने का लेकिन हल्की सी आंधी में बिखर जाते हैं."

"तलाक़-ए-बिद्दत में समझौता की गुंजाइश कहां है? जब तीन तलाक़ हो गया तो समझौता कहां है. सुप्रीम कोर्ट के 22 अगस्त को इसे गैरक़ानूनी करार देने के बाद भी तलाक़-ए-बिद्दत रुका नहीं. इसमें क्षण भर में महिला को बदहाली में लाकर सड़क पर खड़ा कर दिया. तीन तलाक़ से तीन अत्याचार होता है. पहला राजनीतिक दूसरा आर्थिक और तीसरा सामाजिक."

"22 देशों में वर्षों से ये बदलाव हो चुका है लेकिन भारत में नहीं हुआ. यहां महिलाओं के अधिकारों के साथ सियासत खेली जाती है."

"सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद भी तलाक़-ए-बिद्दत यानी तीन तलाक़ दिया जा रहा है. सुप्रीम कोर्ट का डिक्री क़ानून है. इसके बावजूद क्या महिलाएं ऐसे प्रत्येक मामले के बाद क्या सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दर्ज कर सकती है. इसलिए संसद में इसके क़ानून की ज़रूरत पड़ी. ज़रूरत तो है मुस्लिम लॉ को कोडिफाइ किया जाये."
राष्ट्रीय जनता दल के सांसद जयप्रकाश यादव ने कहा कि "इस मसले पर मुस्लिम पर्सनल बोर्ड से मशविरा और सहमति की कोशिश की जानी चाहिए. पति जेल में, पत्नी घर में, बच्चों की परवरिश कौन करेगा. सकारात्मक पहल होना चाहिए."
हैदराबाद से एआईएमआईएम के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने कहा, "संसद को इस मसले पर क़ानून बनाने का कोई क़ानूनी हक नहीं है क्योंकि ये विधेयक मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है. ये संविधान के अनुच्छेद 15 का उल्लंघन है. सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही तलाक-ए-बिद्दत को रद्द कर दिया है."

"देश में पहले से क़ानून हैं, घरेलू हिंसा निवारण अधिनियम है, आईपीसी है. आप वैसे ही काम को फिर से अपराध घोषित नहीं कर सकते. इस बिल में विरोधाभास हैं. ये बिल कहता है कि जब पति को जेल भेज दिया जाएगा, तब भी सहवास का अधिकार बना रहेगा. उसे भत्ता देना होगा."
"ये कैसे संभव है कि जो आदमी जेल में हो और भत्ता भी अदा करे. आप कैसा क़ानून बना रहे हैं. मंत्री जी ने शुरुआत में ही कहा कि बिल पर मशविरा नहीं किया गया है. अगर ये बिल पास हो जाता है तो मुस्लिम महिलाओं के साथ नाइंसाफ़ी होगी. लोग अपनी पत्नियों को छोड़ देंगे."
"देश में 20 लाख ऐसी महिलाएं हैं, जिन्हें उनके पतियों ने छोड़ दिया है और वो मुसलमान नहीं हैं. उनके लिए क़ानून बनाए जाने की ज़रूरत है. इनमें गुजरात में हमारी भाभी भी है. उन्हें इंसाफ़ दिलाए जाने की ज़रूरत है. ये सरकार ऐसा नहीं कर रही है."

केरल से मुस्लिम लीग के सांसद मोहम्मद बशीर ने कहा, ये विधेयक संविधान के अनुच्छद 25 का उल्लंघन है. ये विधेयक पर्सनल लॉ में अतिक्रमण करता है

बीजू जनता दल के सासंद भृतहरि महताब ने कहा, इस बिल में कमियां हैं. इस बिल में कई विरोधाभास हैं.
http://www.bbc.com/hindi/india-42499887
-----------
जानिए तीन तलाक बिल में क्या है खास बातें
देश के बहुचर्चित मामलों में से एक तीन तलाक पर आज लोकसभा में सरकार बिल पेश करेगी। इस बाबत सरकार ने अपने सभी सांसदों को व्हिप जारी कर संसद में मौजूद रहने को कहा है। दूसरी ओर कांग्रेस पार्टी भी सरकार द्वारा पेश किए गए तीन तलाक बिल का लोकसभा में समर्थन में कर सकती है। बता दें कि तीन तलाक बिल को गृह मंत्री राजनाथ सिंह की अगुवाई वाले मंत्रीस्तरीय समूह ने तैयार किया है।
कैसा होगा तीन तलाक बिल?
सरकार ‘द मुस्लिम वीमेन प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स इन मैरिज एक्ट’ नाम से बिल को पेश करने जा रही है। ये कानून सिर्फ तीन तलाक (INSTANT TALAQ, यानि तलाक-ए-बिद्दत) पर ही लागू होगा। खास बात ये है कि इस कानून के बाद कोई भी मुस्लिम पति अगर पत्नी को तीन तलाक देगा तो वो गैर-कानूनी माना जाएगा। इतना ही नहीं, कानून के लागू होने के बाद किसी भी स्वरूप में दिया गया तीन तलाक वह चाहें मौखिक हो, लिखित और या मैसेज में हो अवैध कहलाएगा। साथ ही जो भी शख्स तीन तलाक देगा उसे तीन साल की सजा या फिर जुर्माना हो सकता है। कहने का मतलब ये है कि तीन तलाक देना गैर-जमानती और संज्ञेय (Cognizable) अपराध होगा और इसमें मजिस्ट्रेट तय करेगा कि जुर्माना कितना होगा.
प्रस्तावित बिल में खास बातें
प्रस्तावित तीन तलाक बिल में कुछ खास बातें हैं। पहली,एक साथ तीन बार तलाक (बोलकर, लिखकर या ईमेल, एसएमएस और व्हाट्सएप जैसे इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से) कहना गैरकानूनी होगा। दूसरी, ऐसा करने वाले पति को तीन साल के कारावास की सजा हो सकती है। यह गैर-जमानती और संज्ञेय अपराध माना जाएगा। तीसरी, यह कानून सिर्फ 'तलाक ए बिद्दत' यानी एक साथ तीन बार तलाक बोलने पर लागू होगा। चौथी, तलाक की पीड़िता अपने और नाबालिग बच्चों के लिए गुजारा भत्ता मांगने के लिए मजिस्ट्रेट से अपील कर सकेगी। पांचवीं, पीड़ित महिला मजिस्ट्रेट से नाबालिग बच्चों के संरक्षण का भी अनुरोध कर सकती है. मजिस्ट्रेट इस मुद्दे पर अंतिम फैसला करेंगे। छठी, यह प्रस्तावित कानून जम्मू-कश्मीर को छोड़कर पूरे देश में लागू होगा है।


.....
BBC News हिंदी | एक बार में तीन तलाक़ बिल पर क्यों खफ़ा हैं राजनीतिक दल? - http://www.bbc.com/hindi/india-42494768?ocid=wshindi.chat-apps.in-app-msg.whatsapp.trial.link1_.auin

طلاق سے متعلق حکومت کا مجوزہ قانون

قوموں کی بدبختی اور زوال کے اسباب میں سے ایک سبب یہ بھی ہوتا ہے کہ وہ اپنے حقیقی مسائل سے غافل ہوجائیں اور اپنی صلاحیتیں ایسے کاموں میں صرف کرنے لگیں ، جن کا کوئی فائدہ نہیں، اس وقت ہمارا ملک اسی صورت حال سے گذر رہا ہے، ملک کی معیشت مسلسل انحطاط پذیر ہے، شرح ترقی گھٹتی جارہی ہے، کارخانے بند ہورہے ہیں، ہمارے وزیر اعظم شاید آدھی دنیا کا سفر کرچکے ہیں لیکن سرمایہ کاری میں اضافہ تو کجا، ہمارا سفرتنزل کی طرف جاری ہے، روزگار کے مواقع گھٹتے جارہے ہیں، ملک کی دولت چند ہاتھوں میں سمٹ آئی ہے ، بڑے بڑے سرمایہ دار اور صنعت کار بینکوں سے بھاری قرض حاصل کرکے عوام کی گاڑھی کمائی کو ڈبو رہے ہیں، امن و قانون کی صورت حال اتنی ابتر ہوچکی ہے کہ پوری دنیا ہم پر خندہ زن ہے، یہ اور اس طرح کی بہت سی ناکامیاں ہیں ،جو دوپہر کی دھوپ کی طرح معمولی سمجھ بوجھ رکھنے والے پر بھی واضح اور عیاں ہیں۔
بجائے اس کے کہ حکومت ان حقیقی مسائل پر توجہ کرتی، اپنے نفرت کے ایجنڈے کو بڑھاتے ہوئے اقلیتوں اور دلتوں کو پریشان کرنے اور فرقہ وارانہ بنیاد پر اپنے ووٹ بینک کو مضبوط کرنے کی بے فائدہ کوششوں میں لگی ہوئی ہے، ایسی ہی نامسعود اور ناروا کوششوں میں ایک مطلقہ خواتین سے متعلق مجوزہ قانون ہے جسے ’’مسلم خواتین سے متعلق حقوق کے تحفظ کابل ۲۰۱۷ء‘‘ کا نام دیاگیا ہے، بل میں کہا گیا ہے کہ طلاق بدعت (ایک ساتھ تین طلاق) اور اس کی مماثل طلاق کی وہ تمام شکلیں جو فوری طورپر اثر انداز ہوں اور جن میں رجعت کی گنجائش نہیں ہو، باطل اور غیر قانونی ہوں گی، خواہ زبانی طلاق دی جائے یا تحریر کے ذریعہ یا کسی اور ذریعہ سے، اور اگر کوئی شخص ایسا کرتا ہے تو اس کو تین سال کی جیل ہوگی اور اس کے علاوہ جرمانہ ہوگا، نیز اس مطلقہ عورت اور اس کے زیر کفالت بچوں کا نفقہ طلاق دینے والے شخص پر ہوگا اور مجسٹریٹ اس کو طے کرے گا، نابالغ بچوں کی نگہداشت و پرورش کا حق بھی عورت کو حاصل ہوگا، نیز مجرم کے خلاف ناقابل ضمانت وارنٹ جاری ہوگا اور یہ قابل دست اندازی پولس گا۔
غور کیا جائے تو یہ مجوزہ قانون شریعت ِاسلامی میں مداخلت بھی ہے اوردستور کی روح کے مغائر بھی ،نامنصفانہ بھی ہے اور خود عورتوں کے مفاد کے خلاف بھی، نیز تضادات کا حامل بھی۔
اس میں ایک پہلو تو شریعت اسلامی میں مداخلت کا ہے اور یہ مداخلت ایک آدھ مسئلہ تک محدود نہیں ہے ؛ بلکہ یہ کئی جہتوں سے شریعت کے عائلی قوانین کو متاثر کرتا ہے، جس کو درج ذیل نکات میں سمجھا جاسکتا ہے :
(۱) اولاً یہ قانون ’طلاق ِبدعت‘ جس سے خود اس بل کی توضیحات کے مطابق ایک ساتھ دی گئی تین طلاقیں مراد ہیں، باطل، کالعدم اور غیر مؤثر قرار دیتا ہے، یعنی تین طلاق دینے کی صورت میں ایک طلاق بھی نہیں پڑے گی، یہ ایسی بات ہے جس کے غلط ہونے پر مسلمانوں کے تمام مکاتب ِفکر متفق ہیں ، ایک ساتھ دی گئی تین طلاق کا کیا اثر مرتب ہوگا؟ اس میں فقہاء کے درمیان اس بارے میں ضرور اختلاف ہے کہ یہ تینوں طلاقیں واقع ہوں گی یا ایک ہی طلاق واقع ہوگی؟ جمہور اہل سنت کے نزدیک تینوں طلاقیں واقع ہوجائیں گی، اہل حدیث اور شیعہ حضرات کے نزدیک ایک طلاق واقع ہوگی لیکن اس میں کوئی اختلاف نہیں کہ ایسا نہیں ہوگا کہ ایک ساتھ دی گئی تینوں طلاقیں بالکل ہی بے اثر ہوجائیں گی، اور ایک طلاق بھی واقع نہیں ہوگی، اور یہ بات عقل عام کے بھی خلاف ہے کہ کوئی شخص اپنے حق طلاق کا استعمال کرتے ہوئے ایک طلاق دے تو وہ تو واقع ہوجائے اور تین طلاق دے تو ایک بھی واقع نہیں ہو۔
(۲) مجوزہ قانون کے مطابق طلاق بدعت کے ساتھ ساتھ اس کے مماثل طلاق کی وہ تمام صورتیں بے اثر ہوں گی، جن سے فوری طورپر رشتۂ نکاح ختم ہوجاتا ہو اور رجعت کی گنجائش باقی نہیں رہتی ہو،گویاطلاق بائن بھی واقع نہیں ہوگی، اس کے دُور رس اثرات پڑیں گے، اگر نکاح کے بعد رُخصتی کی نوبت نہیں آئی اور کوئی ایسی صورت پیدا ہوگئی ، جس کی وجہ سے نوبت طلاق کی آگئی ، خواہ یہ صورت لڑکی والوں کی طرف پیدا ہوئی ہو یا لڑکا اور اس کے گھر والوں کی طرف سے، تو ایسی صورت میں اگر اس نے ایک طلاق دے دی تو یہ بھی طلاق بائن میں شامل ہے، قانون کی رو سے یہ طلاق بھی کالعدم ہوگی ۔
(۳) اگر شوہر تین طلاق سے بچتے ہوئے فوری طورپر رشتۂ نکاح ختم کرنا چاہے تو اس کی صورت یہی ہے کہ ایک طلاق بائن دے دی جائے تاکہ نکاح ختم ہوجائے لیکن دونوں فریق کی رضامند ی سے دوبارہ نکاح کی گنجائش باقی رہے، اکثر سنجیدہ فیصلہ کے تحت اسی طرح طلاق دی جاتی ہے، اگر باہمی تعلقات خراب ہوگئے خاندان اور سماج کے لوگوں نے محسوس کیا کہ اس رشتہ کو ختم کردیا جائے تو شوہر سے یہی طلاق دلوائی جاتی ہے اور عورت کو اس کا فائدہ پہنچتا ہے کہ وہ اپنی ذات کے بارے میں آزاد رہتی ہے، شوہر اپنی رضامندی کے بغیر اس کو اپنے نکاح میں واپس نہیں لاسکتا، اس قانون کی رو سے یہ طلاق غیر معتبر ہوجائے گی اور چاہے عورت راضی نہ ہو مرد کو حق حاصل ہوگا، وہ اس کو واپس آنے پر مجبور کرے۔
(۴) بعض دفعہ شوہر و بیوی آپسی رضامندی سے’خلع‘ کا معاملہ طے کرتے ہیں، خلع کے ذریعہ واقع ہونے والی طلاق بھی طلاق بائن ہے، مجوزہ قانون میں طلاق بائن کی ایسی صورت کو مستثنیٰ کرنے کی کوئی صراحت نہیں ہے جو عورت کی رضامندی سے دی گئی ہو، اس لئے عدالتیں اس طلاق کو بھی کالعدم قرار دے سکتی ہیں اور اس کا نتیجہ یہ ہوگا کہ عورت نے اپنے لئے نجات و آزادی کا جو راستہ نکالا تھا، وہ بند ہوکر رہ جائے گا اور اسے ناپسندیدگی کے باوجود اس رشتہ کو باقی رکھنا پڑے گا۔
(۵) طلاق بائن ہی کی ایک صورت ’ایلاء‘ ہے، یعنی اگر شوہر چار ماہ یا اس سے زیادہ یا ہمیشہ کے لئے بیوی کے ساتھ شوہر و بیوی کے مخصوص تعلقات قائم نہ کرنے کی قسم کھالے اور اس پر عمل کرنے لگے، یہاں تک کہ چار ماہ گزر جائے تو اس کی بیوی پر آپ سے آپ ایک طلاق بائن واقع ہوجائے گی تاکہ وہ شوہر کے اس تکلیف دہ عمل سے نجات پاسکے، چوں کہ طلاق کی اس صورت میں بھی رجعت کی گنجائش نہیں ہے، اس لئے بظاہر اِس پر بھی اِس قانون کا اطلاق ہوگا، اس کو بھی کالعدم سمجھا جائے گا اور عورت شوہر کے ظالمانہ رویہ کے باوجود اس کی قید ِنکاح سے آزاد نہیں ہوسکے گی۔
(۶) اس مجوزہ قانون میں یہ بات بھی کہی گئی ہے کہ طلاق کی صورت میں ایک شادی شدہ مسلمان عورت اپنے نابالغ بچوں کی نگہداشت اور پرورش کی حقدار ہوگی، اسلام نے یقینا حق پرورش کے معاملہ میں ماں کو باپ پر ترجیح دی ہے لیکن شریعت میں اصل اہمیت بچہ کے مفاد کی ہے، اسی لئے عام حالات میں لڑکی کے بالغ ہونے تک حق پرورش ماں کو دیا گیا ہے، کیوں کہ وہ زیادہ بہتر طورپر بیٹی کے مسائل کو سمجھ سکتی ہے، اس کی عزت و آبرو کی حفاظت کرسکتی ہے اور اس کی تربیت کا فریضہ انجام دے سکتی ہے، لڑکے چھ سات سال تک ماں کے زیر پرورش رہیں گے، اس کے بعد باپ کو حق پرورش حاصل ہوگا، کیوں کہ اس عمر کے بعد باپ زیادہ بہتر طورپر بچے کی تربیت کا فریضہ انجام دے سکتا ہے، اور یہ مشاہدہ ہے کہ لڑکے عام طور پر ماں کے قابو میں نہیں رہتے، البتہ اگر بالغ ہونے کے بعد بھی لڑکی کو باپ کے حوالہ کرنا اس کے مفاد میں نہیں ہو، یا لڑکے کو سات آٹھ سال تک ماں کے پاس رکھنا یا اس کے بعد اس کے باپ کے حوالہ کردینا کسی وجہ سے بچہ کے مفاد میں نہیں ہو تو بچہ کے مفاد کو ترجیح دی جائے گی، اس اُصول کو شریعت میں اس قدر اہمیت دی گئی ہے کہ اگر شوہر و بیوی کے درمیان اس شرط پر خلع ہو کہ بیوی بچہ کے حق پرورش سے دستبردار ہوجائے گی؛ حالاں کہ بچہ ابھی بہت چھوٹا ہو اور ماں کے بغیر نہیں رہ سکتا ہو، تب بھی بچہ کے مفاد کو ترجیح دیتے ہوئے یہ معاہدہ کالعدم ہوجائے گا اور ماں کو حق پرورش حاصل رہے گا، البتہ بچہ جب بھی ماں باپ میں سے ایک کے زیر پرورش ہو تو دوسرے فریق کو وقتاً فوقتاً بچوں سے ملاقات کا حق حاصل رہے گا۔
شرعاً حق پرورش بعض دفعہ ماں کے علاوہ باپ ہی کو نہیں، بلکہ دوسرے رشتہ داروں جیسے نانی، دادی، بہن، خالہ اور پھوپھی وغیرہ کو بھی حاصل ہوتا ہے اور جب عورت کسی ایسے مرد سے نکاح کرلے جو زیر پرورش لڑکے یا لڑکی کا محرم رشتہ دار نہ ہو تو ماں کا حق پرورش ختم ہوجاتا ہے، کیوں کہ ایسی صورت میں بچے کو ماں کے زیر پرورش رکھنا بچوں کے مفاد میں نہیں ہوتا لیکن اس مجوزہ قانون کے رو سے مطلقاً ماں کو پرورش کا حقدار قرار دے دیا گیا ہے، اس سے باپ اور دوسرے حقداروں کے حقوق متأثر ہوں گے اور خود بچوں کو نقصان پہنچے گا۔
(۷) اس مجوزہ قانون میں مطلقہ اوراس کے بچوں دونوں کانفقہ مرد پر عائد کیا گیا ہے، حالاں کہ طلاق کے بعدعورت کانفقہ سابق شوہر پر واجب نہیں ہوتا، ہاں، بچے چوں کہ اسی کی اولاد ہیں، اس لئے ان کا نفقہ باپ کے ذمہ ہوگا اور جب تک حق پرورش حاصل ہونے کی بناپر عورت ان بچوں کی پرورش کرے گی تو پرورش کی اُجرت اس مرد کے ذمہ واجب ہوگی۔
(۸) مجوزہ قانون کی دفعہ :۴؍ میں فوری اثر کے ساتھ پڑنے والی ناقابل رجعت طلاق پر تین سال کی جیل کی سزا اور اس کے علاوہ جرمانہ کی بات کہی گئی ہے، ایک تواس لئے یہ سزا غیرمنصفانہ ہے کہ ایک ساتھ تین طلاق دینا شریعت میں ضرور ناپسندیدہ عمل ہے اور یہ گناہ کے دائرہ میں آتا ہے لیکن طلاق بائن ایسا عمل نہیں ہے جو بہرحال گناہ کے دائرہ میں آتا ہو، یا فقہاء کی اصطلاح میں طلاق بدعت ہو، اس لئے اس پر سزا دینا شرعاً ناقابل قبول ہے ۔
(۹) مجوزہ مسودہ قانون میں اگرچہ مقاصد و اسباب کے تحت بین القوسین طلاق بدعت کے ساتھ ایک وقت اور ایک ہی بار میں تین طلاق کا ذکر آیا ہے لیکن عدالتیں عام طورپر قانون کے متن کو پیش نظر رکھتی ہیں ،اس میں اس کی صراحت نہیں ہے اور صورت حال یہ ہے کہ طلاق بدعت صرف یکبارگی تین طلاق تک محدود نہیں بلکہ فقہاء نے حالت حیض میں طلاق دینے کو بھی بدعت قرار دیا ہے، چاہے ایک ہی طلاق دی جائے تو عدالتیں اس سلسلہ میں غلط فہمی کا شکار ہوسکتی ہیں اور وکلاء جو الفاظ کی بازی گری سے اپنے کیس کو ثابت کرنے میں مہارت رکھتے ہیں. وہ ایسے شخص کے لئے بھی اس طرح کی سزا کا مطالبہ کرسکتے ہیں ،جس نے اس دوسرے پہلو سے طلاق بدعت دی ہو۔
یہ تو اس مجوزہ قانون کا شرعی پہلو ہے، اب اس بات کو دیکھئے کہ از روئے انصاف یہ قانون کس حد تک قابل قبول ہے اور کہیں یہ خود تضادکا حامل تو نہیں ہے، اس سلسلہ میں چند نکات کو پیش نظر رکھنا چاہئے:
(۱) اس قانون کی رو سے ایک ساتھ دی گئی تین طلاقیں بالکل نامعتبراور کالعدم ہیں، جن کا کوئی اثر مرتب نہیں ہوگا، یعنی ایک بھی طلاق نہیں پڑے گی تو سوال یہ ہے کہ جوعمل وجود ہی میں نہیں آیا اور قانون کی رو سے عورت اس سے متاثر ہی نہیں ہوئی ، تو پھر اس پر سزا دینے کے کیا معنی ہوں گے ، اگر کسی شخص نے فضاء میں فائرنگ کی اوراس کی فائرنگ سے کسی شخص کی جان نہیں گئی تو کیا ایسے شخص کو قتل کی سزا دی جائے گی؟
(۲) اس قانون کی روسے ایک طرف مرد کو تین سال کے لئے جیل بھیجا جائے گا اور دوسری طرف اس پر عورت اور اس کے بچوں کے نفقہ کی ذمہ داری ہوگی، یہ کھلا ہوا تضاد ہے، جب وہ جیل میں ہوگا اور محنت و مزدوری نہیں کرے گا تو وہ عورت اور بچوں کی کفالت کس طرح کرے گا؟ خاص طورپر یہ بات بھی قابل توجہ ہے کہ تین طلاق دینے کے واقعات زیادہ تر کم تعلیم یافتہ، غریب اور معمولی روزگار کے حامل لوگوں کے یہاں پیش آتے ہیں، جوبے چارے روز کماتے اور روز کھاتے ہیں۔
(۳) یہ بات بھی نامنصفانہ ہے کہ دنگے فساد میں شامل ہونے والے اور مذہبی مقامات کو نقصان پہنچانے والے کو تو دو سال کی سزا ہو، کرپشن اور چار سو بیسی کرنے والے کو ایک سال کی سزا ہو لیکن تین طلاق دینے والے کو تین سال کی سزا دی جائے اور اس کے علاوہ جرمانہ بھی عاید کیا جائے ، یہ نہایت غیر متوازن، مبالغہ آمیز اور غیر منصفانہ سزا ہے۔
(۴) اس سزا کو مزید سخت کرنے کے لئے اس کو ناقابل ضمانت اور قابل دست اندازی پولس قراردیا گیا ہے، حالاںکہ یہ کوئی ایسا جرم نہیں ہے، جس میں کسی کو جسمانی مضرت پہنچائی گئی ہو یا عزت و آبرو پر ہاتھ ڈالا گیا ہو، کیااس میں کوئی معقولیت ہے؟
(۵) پھر اس قانون میں یہ بات نہیں کہی گئی ہے کہ عورت کے دعویٰ کرنے پر کارروائی کی جائے گی، مجوزہ قانون مطلق ہے، بظاہر اس کا تقاضا ہے کہ اگر اس شخص کا پڑوسی یا کوئی بدخواہ بلا کسی ثبوت کے یاعورت اور اس کے گھر کے لوگ مرد کے خلاف پولیس میں شکایت کردیں تو اس بیچارے کو ہتھکڑی لگ جائے، ایسا بے قید قانون ظلم و زیادتی کے دروازے کو کھول دے گا۔
(۶) یہ بات بھی قابل توجہ ہے کہ تین طلاق کے کالعدم ہونے کا مطلب یہ ہے کہ جب شوہر تین سال کی سزا کاٹ کر آئے گا، تو پھر وہ اس عورت کے ساتھ ازدواجی زندگی بسر کرے گا، غور کیجئے، جو مرد اپنی بیوی کی طرف سے تین سال کی طویل سزا کاٹ کر اور خطیر جرمانہ اداکرکے آیا ہے ، کیا وہ دونوں ایک دوسرے کے ساتھ خوشگوار ازدواجی زندگی بسر کرسکیں گے اور انھیں بزور طاقت ایک دوسرے کے ساتھ رہنے پر مجبور کرنا عقلمندی کی بات ہوگی؟
(۷) اس طرح کے قوانین عورت کے لئے مشکلات پیدا کریں گے، جو لوگ اپنی بیوی سے علاحدگی چاہیں گے اور ان کے لئے تین طلاق یا طلاق بائن کا راستہ بند ہوجائے گا، وہ بیوی کو لٹکا کر رکھیں گے، نہ اس کے حقوق ادا کریں گے اور نہ طلاق دیں گے، ایسی معلقہ عورت کی صورتِ حال مطلقہ سے بھی بدتر ہوتی ہے، کیوں کہ نہ وہ اپنے حقوق پاتی ہیں اور نہ اپنی ذات کے بارے میں آزاد ہوتی ہیں۔
(۸) یہ تو ان لوگوں کے لئے ہے، جن کے دلوں میں کچھ نہ کچھ اللہ کا خوف ہے، جن کو حلال و حرام کی فکر نہ ہو، وہ سوچیں گے کہ ساری مصیبت نکاح کرنے اور نکاح کے بعد طلاق دینے سے پیداہورہی ہے ؛ اس لئے نکاح ہی نہ کیا جائے ؛ بلکہ چوںکہ قانون بالغ مرد و عورت کو آپسی رضامندی سے ایک ساتھ زندگی گزارنے اور صنفی تعلقات قائم کرنے کی اجازت دیتا ہے، اس لئے جب تک جس کے ساتھ موافقت رہے ،زندگی اس کے ساتھ گزاری جائے، اور جب جی اُکتا جائے، نیا رفیق تلاش کرلیا جائے، طلاق کو مشکل بنانا ان اہم اسباب میں سے ہے، جن کی وجہ سے اس وقت مغربی ملکوں میں نکاح کی شرح گھٹتی جارہی ہے، خاندانی نظام بکھرتا جارہا ہے اور اپنی پہچان سے محروم بچوں کی تعداد میں خطرناک حد تک اضافہ ہوتا جارہا ہے ؛اس لئے حقیقت یہ ہے کہ خواتین کے حقوق کی حفاظت کے نام پر بننے والا یہ قانون اپنے اثرات و نتائج کے اعتبار سے خود خواتین کے لئے نقصاندہ ہے۔
البتہ شریعت کے دائرہ میں رہتے ہوئے اس مسئلہ کو حل کرنے کی کوشش کی جاسکتی ہے اور اس کے چند اہم نکات یہ ہوسکتے ہیں:
(۱) صرف ایک ساتھ تین طلاق دینے پر ایک مناسب اور متوازن سزا تجویز کی جائے، اور وہ سزا ایسی ہو جس سے مطلقہ عورت کو فائدہ ہو ۔
(۲) بچوں کا نفقہ تو شرعاً اس کے باپ پر واجب ہے ہی، اس کے ساتھ ساتھ جب تک عورت بچوں کی پرورش کرے، اس کو سابق شوہر کی طرف سے مناسب اُجرت پرورش بھی دلائی جائے، جو فقہاء کی تصریحات کے مطابق اتنی ہونی چاہئے کہ اس کے خورد و نوش اور رہائش کا انتظام ہوجائے۔
(۳) مہر اور نفقۂ عدت جلد سے جلد ادا کروایا جائے۔
(۴) اس نوعیت کے مقدمات کے لئے فاسٹ ٹریک عدالتیں قائم کی جائیں، جو ایک مقررہ مدت مثلاً تین ماہ کے اندر فیصلہ سنادے۔
(۵) حکومت ایسی مظلوم عورتوں کی طرف سے وکیل کی ذمہ داری قبول کرے اور متاثرہ عورت پر اخراجات مقدمہ کا بوجھ نہ ڈالا جائے۔
ٍ یہ تو اس مجوزہ قانون کے اثرات و نتائج اور ان کے حل کے بارے میں گفتگو تھی لیکن یہ بات بھی بہت اہم ہے کہ ہندوستان کے دستور کی بنیاد کثرت میں وحدت اور اقلیتوں کی مذہبی و تہذیبی آزادی پر ہے؛اسی لئے دستور کے بنیادی حقوق کی دفعات میں اس کی ضمانت دی گئی ہے، حکومت کو ہرگز کوئی ایسا قدم نہیں اُٹھانا چاہئے، جو دستور سے انحراف پر مبنی ہو، اس کی روح کو متاثر کرتا ہو، اوراس سے اقلیتوں میں عدم تحفظ کا احساس پیدا ہو۔
مولانا خالد سیف اللہ رحمانی
.....
تین طلاق سے متعلق بل لوک سبھا میں پاس، ترمیمات خارج، تین سال کی سزا اور جرمانہ کا بندوبست
http://dhunt.in/3jevt?s=a&ss=pd
via Dailyhunt
اپلی کیشن حاصل کریں
http://dhunt.in/DWND
.....
حکومت کا تین طلاق پر بل شریعت میں راست مداخلت: دارالعلوم دیوبند
http://dhunt.in/3jf8l?s=a&ss=pd
via Dailyhunt
....
طلاق ثلاثہ بل پر مولانا خالد سیف اللہ رحمانی کا حوصلہ افزا بیان ۔
ضرور سنین اور دوسروں سے شیئر کریں
https://youtu.be/B-Azn1i19Yw
#TripleTalaqBill
.....
طلاق ثلاثہ پربل :آزاد ہندوستان کی تاریخ کا بدترین دن: جمیعۃ علماء
http://sonews.in/XMKu
تین طلاق بل: لوک سبھا میں بحث کے دوران ایم جے اکبر اور اسد الدین اویسی کے درمیان نوک جھونک
http://dhunt.in/3jg0e?s=a&ss=pd
via Dailyhunt
اپلی کیشن حاصل کریں
http://dhunt.in/DWND
....
شہر کی سنی جماعتوں کا بعد نماز جمعہ طلاق ثلاثہ مخالف بل کے خلاف احتجاج کا فیصلہ
http://dhunt.in/3jf8o?s=a&ss=pd
via Dailyhunt
....
تین طلاق پر بل کا مقصد مسلم معاشرہ کو تباہ کرنا اور جیلوں کو مسلم مردوں سے آباد کرنا ہے : مسلم پرسنل لا بورڈ
http://dhunt.in/3jh8g?s=a&ss=pd
via Dailyhunt
اپلی کیشن حاصل کریں
http://dhunt.in/DWND
......
.....
NBT: तीन तलाक विरोधी बिल पर बोला मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, लोकतांत्रिक तरीकों से कराएंगे खत्म
http://nbt.in/ba3TBa/baa via @NavbharatTimes: http://app.nbt.in
.....
NBT: लोकसभा में ध्वनिमत से पारित हुआ तीन तलाक बिल
http://nbt.in/FT2NtZ/baa via @NavbharatTimes: http://app.nbt.in
.....
BBC News हिंदी | एक बार में तीन तलाक़ बिल पर क्यों खफ़ा हैं राजनीतिक दल? - http://www.bbc.com/hindi/india-42494768?ocid=wshindi.chat-apps.in-app-msg.whatsapp.trial.link1_.auin
.....
بابری مسجد کی شہادت کے متعلق صحافی روچیرا گپتا کا خوفنا ک خلاصہ۔ ویڈیو
http://dhunt.in/3jbZd?s=a&ss=pd
via Dailyhunt
اپلی کیشن حاصل کریں
http://dhunt.in/DWND
....
अंजना ॐ कश्यप ने उलेमा का उड़ाया मज़ाक़ आज अकड़ी दाढ़ियों से निकल रहा है पसीना जवाब मिला तुम बाबाओ के आश्रमों से बचो!!  http://www.haqeqathindi.com/in-the-news/अंजना-ॐ-कश्यप-ने-उलेमा-का-उ/
....
तीन तलाक़ बिल पर असदउद्दीन ओवैसी ने लोकसभा में सुनाई बंदर और मछलियों की कहानी!!  http://www.haqeqathindi.com/in-the-news/तीन-तलाक़-बिल-पर-असदउद्दीन/
....
تین طلاق سے متعلق بل آخرلوک سبھاسے منظور، اپوزیشن کے تمام اعتراضات مسترد، اعتراض،ترمیمات اورتجاویزنظرانداز، اسٹینڈنگ کمیٹی کوبھیجنے کامطالبہ بھی تسلیم نہیں
http://sonews.in/4nLpR
.....
ملکاارجن کھڑگے نے بل کومستقل کمیٹی میں بھیجنے کامطالبہ کیا، سشمتا دیو نے پوچھے تلخ سوالات،سرکارنے کہا، جوتجاویز ہیں پارلیمنٹ میں ہی دیں
http://sonews.in/a6nE
.....
مرکزی حکومت کے طلاق ثلاثہ بل میں کئی قانونی خامیاں: اے پی سی آر نے کی بل کی سخت مخالفت
http://sonews.in/Q3G1s
.....
تین طلاق: ملک میں لاکھوں ہندوبہنوں اورگجرات کی بھابھی کو بھی انصاف ملنا چاہیے، بحث کے دوران اویسی کاسخت حملہ
http://sonews.in/fRmAc
....
तीन तलाक़ पर लोकसभा में पास हुआ बिल सिर्फ ओवैसी और बीजू जनता दल के साँसद ने जताया विरोध!!  http://www.haqeqathindi.com/national/तीन-तलाक़-पर-लोकसभा-में-पास/
....
जानिए क्या है तीन तलाक़ पर लोकसभा में पास होने वाला क़ानून!!  http://www.haqeqathindi.com/national/जानिए-क्या-है-तीन-तलाक़-पर-ल/
....
https://youtu.be/csDYnEICrFc
....
لوک سبھا مین طلاق ثلاثہ بل پر اسدالدین اویسی نے کی زوردار تقریر
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=2052616791639576&id=1715704431997482
....
ترک صدر رجب طیب اردغان نے بشار الاسد کو بتایا دہشت گرد ، کہا : ان کے ساتھ کام کرنا ناممکن
http://dhunt.in/3jh3s?s=a&ss=pd
via Dailyhunt
اپلی کیشن حاصل کریں
http://dhunt.in/DWND
.....
رضا اکیڈمی اور آل انڈیا علما کونسل سمیت متعدد مسلم تنظیموں کی تین طلاق بل کی مخالفت ، احتجاج کا فیصلہ
http://dhunt.in/3jh8f?s=a&ss=pd
via Dailyhunt
اپلی کیشن حاصل کریں
http://dhunt.in/DWND
......
آج کچھ درد مرے دل میں سوا ہوتا ہے.......
  ہم بے کار لوگ ہیں...... ہماری تنظیمیں ناکارہ........ ہمارے رہنما بے عمل بلکہ بدعمل ہیں...... ابھی ہمیں اور برے دنوں کا انتظار کرنا چاہیئے.....
جب پارلمنٹ میں شریعت مخالف بل پیش ہورہا تھا اس وقت کہاں تھے مسلم ممبران پارلمنٹ....... مولانا اسرار الحق جو اخبارات میں لمبے لمبے مضامین لکھتے ہیں ' ان کی خدمت میں یہ ناچیز عرض کرتا ہے کہ......
"  حضرت اخبارات میں مضا.مین لکھنے کا کام ہم جیسے ٹٹ پونچیوں کے لئے چھوڑ دیجئے...... آپ تو عزت ماب ایم پی ہیں..... آپ کو تو ایوان میں گرجنا چاہیئے....... آج اتنا اہم بل پیش ہورہا تھا مگر مسلمان آج ایوان میں آنجناب کے رخ زیبا کی زیارت سے بھی محروم رہے...... افسوس! !
     مولانا اجمل بھی ندارد رہے..... جن کو آسامی مسلمانوں نے اپنے سروں پر بیٹھا کر لیڈر بنایا ہے....... شاید کسی خانقاہ میں ضرب الا اللہ لگارہے ہوں........
  بظاہر یہ بات درست لگتی ہے کہ اب پرانی باتوں تو دہرانے سے کوئی فائدہ نہیں......... مگرہم جب تک اپنے رہنماوں کے اندر احتساب کا خوف نہیں پیدا کریں گے یہ آئندہ بھی ہوتا رہے گا........
  مسلم ممبران پارلمنٹ کو چاۂئے کہ وہ قوم کو جواب دیں کہ اس دن ایوان سے کیوں غیر حاضر رہے..... اس سے زیادہ کیا ضروری کام تھا...... ورنہ قوم کے غضب کا سامنا کرنے کے لئے تیار رہیں.ـ
  اس سلسلے میں مسلم تنظیموں کو بھی جواب دینا چاہئے سب کو معلوم تھا کہ یہ بل پیش ہونے والا ہے اسکے لئے پہلے سے تیاررہنا چاہیئے تھا.... حکومت سے ملاقات ' اپوزیشن اراکین کی ذہن سازی اور اس بل کے کمزور پہلووں کی نشاندہی ' اس بل کی دستور سے ٹکرانے والی دفعات کی صراحت اگر ڈھنگ سے کی گئی ہوتی تب بھی یہ بل ممکن تھا کہ اکثریت کے زور پر پاس ہوجاتا مگر حکومت کو ایک مضبوط مخالفت کا سامنا کرنا پڑتا اور کچھ بہتر ترمیمات بھی منظور ہوجاتیں...... آگےراجیہ سبھا کا راستہ حکومت کے لئے اور کٹھن ہوجاتا......  اس کوتاہی کے لئے احقر خود کو بھی ذمہ دار سمجھتا ہے.....
  فی الحال یہ بل اپنی تمام تر خرابیوں کے ساتھ لوک سبھا سے پاس ہو چکا ہے...... اب بھی وقت ہے راجیہ سبھا میں پیش ہونے سے قبل مسلم تنظیمیں تیاری کر رکھیں........
  آگے ایک بار پھر عدالت جانا پڑسکتا ہے........ پچھلی غلطیوں سے سبق لیتے ہوئے اس بار ساری تنظیمیں متحدہ موقف عدالت میں پیش کریں...... مضبوط وکیل کی خدمات حاصل کریں.... وکیل اگرمسلم ہوتو بہتر ہے.....
     تلخ نوائی کے لئے بغیر کسی معذرت کے........
محمود دریابادی
........
سیاسی مقاصد کی تکمیل کیلئے عجلت میں لایا گیا یہ بل ان لوگوں نے تیار کیا ہے جنہیں مسلم سماج کے انداز و مزاج، مسائل و مشکلات، سہولتوں اور دشواریوں کا اندازہ نہیں ہے، انہیں ایک کریمنل لا بنانا تھا، یہی سرکار والا تبار کا آدیش تھا انہوں نے سخت قسم کا قانون ڈرافٹ کردیا، انہوں نے یہ بھی نہیں سونچا کہ دستور کی آرٹیکل ۱۴-۱۵ کی خلاف ورزی ہوگی، جب تین طلاق بے اثر ہے، تو پھر جیل کی سزا کیوں؟ انہوں نے یہ بھی نہیں سونچا کہ جب دوسرے مذہب کے ماننے والوں کیلئے بیوی کو چھوڑدینے کی سزا ایک سال ہے، تو مسلمانوں کو نہ چھوڑنے پر تین سال کی سزا کیوںکر دیجاسکتی ہے؟ کیا یہ قانون سازی میں مذہب کی بنیاد پر تفریق نہیں ہے اور کیا یہ آئین کے مطابق ہے؟
۔۔۔امیر شریعت مولانا محمد ولی رحمانی
(جنرل سکریٹری مسلم پرسنل لا بورڈ)
........
شریعت میں مداخلت افسوس ناک
مسلم قوم کے لیے بیداری کا وقت
(پارلیمنٹ میں بھاجپا حکومت کے تین طلاق مخالف بل پر ایک فکر انگیز تحریر)
از قلم :
حبیب الرحمٰن الاعظمی ابراہیم پوری
فاضل دارالعلوم دیوبند
استاذ تفسیر وحدیث جامعۃ الزاہدات /اتراری خیرآباد/مئو (یوپی)
کفار شرعی احکام میں دخل اندازی کرکے اسلام پر انگلی اٹھارہے ہیں
مسلم خواتین کی مظلومیت کا پروپیگنڈہ کرکے دینی تعلیمات میں نقص وعیب بیان کررہے ہیں اور موجودہ
حکومت اپنی ناکامیوں کو طلاق ثلاثہ مخالف بل پاس کرکے کامیابی میں بدلنا چاہتی ہے جب کہ ملک کی بے شمار غیر مسلم خواتین اعلی ذات سے لے کر پسماندہ ودلت تک مظلوم ہیں اور ناقابل یقین مظالم کا شکار ہیں .ان کی ہمدردی کہاں گئی.
صرف مطلقہ مسلم خواتین کے نام کو اچھال کر مسلم طبقہ کو لوگوں میں بدنام کرنا اور سیاسی نفع پانا ہی مقصد ہے .جس کے پس پردہ خلوص کی معمولی مہک بھی نہیں
ورنہ طلاق ثلاثہ پر سپریم کورٹ کے حالیہ فیصلے جس میں تین طلاق کو غیر مؤثر اور بے عمل کہا گیا ہے، جب کہ شرعی حکم کے اعتبار سے یہ مؤثر اور نکاح کو فورا ختم کرنے والی چیز ہے،  اس کو انجام دینے والا عدالت کے اس فیصلے کے بعد بھی مجرم اور سخت سزا کا مستحق کیسے ہوگیا، اور حکومت سارے مسائل سے پہلو تہی کرتے ہوئے اس کو اتنی جلدی پارلیمنٹ میں پاس کرنے کی عجلت میں کیوں ہے .اور مسلم علماء ، مسلم تنظیموں اور آل انڈیا مسلم پرسنل لا بورڈ کی  تجاویز و اعلانات پر ذرا بھی توجہ کیوں نہ کی گئی.؟؟
قوم مسلم کے لیے نت نئے مسائل سر ابھارے کھڑے ہیں اور حالات ابتر ہی ہوتے جارہے ہیں.گائے اور لوجہاد کے نام پر ہجومی تشدد، قتل و فساد ،نوٹ بندی وسروس ٹیکس کے بعد کی معاشی دشواریاں، الزام دہشت گردی، مقدمہ بابری مسجد ، اور روزانہ کے شرور وفتن یہ سب ایک سیلاب کے مانند اہل اسلام کو بہالیجانا چاہتے ہیں،
  ایسے میں جامع ومؤثر حکمت عملی کے ساتھ متحدہ طور پر میدان میں آنے اور دین وشریعت پر پختگی کے ساتھ عمل کرنے اور گناہ وحرام خوری سے توبہ و رجوع الی اللہ کے ساتھ حقوق العباد کی ادائیگی کی فکر کرنے اور اسلامی محاسن کو غیروں کے سامنے بیان کرنے اور اپنی قوت دفاع کو مضبوط کرنے کے ساتھ باطل کے اعتراضات کا دنداں شکن جواب دینے کی ضرورت ہے .اور اپنے عملی اقدامات سے یہ بتانے اور عیاں کرنے کی ضرورت ہے کہ عورت کی عزت وسربلندی اسلامی احکام پر چلنے ہی میں ہے اور شریعت اسلامیہ نے ہی عورت کو حقیقی تحفظ دیا ہے .
اور آج بھی عورت کو صرف اسلام کے دامن رحمت میں ہی حقیقی عزت مل سکتی ہے .
اللہ ہمارا حامی وناصر ہو
حسبنا اللہ ونعم الوکیل
اللھم انا نجعلک فی نحورھم
ونعوذبک من شرورھم.
حبیب الاعظمی فاضل دیوبند
کاشانہ رحمت ابراہیم پور اعظم گڑھ
28/12/2017  . مطابق7/ربیع الثانی1439ھ ، شب جمعہ
.......
لکیرکاہے پیٹ رہے ہیں بھائی؟!
نایاب حسن
یہ ایک روشن اورناقابلِ انکارحقیقت ہے کہ تین طلاق کامعاملہ بی جے پی کے لیے سیاسی فائدے کا موضوع ہے، اسی طرح، جس طرح بابری مسجد -رام جنم بھومی کامعاملہ، گجرات الیکشن کے نتائج سے اسے پتاچل گیاہے کہ مودی لہرکی ہوانکل چکی ہے اورلوگ ترقی و روزگارجیسے بیسک ایشوزمیں مودی کی ناکامی کومحسوس کرنے لگے ہیں،لہذا اب چوں کہ اگلے سال، ڈیڑھ سال کے اندرہی کئی ریاستوں اور پھر جنرل الیکشن کادورآنے والاہے؛ اس لیے بابری مسجدکے ساتھ ساتھ یہ تین طلاق والی "تھیوری”بھی بڑی عیاری کے ساتھ "اپلائی "کی گئی ہے،تاکہ دوسرے اہم مسائل میڈیاکی سرخیوں اورعوام کے ذہنوں سے غائب ہوجائیں، ساراملک اس حقیقت سے باخبر ہے کہ بیویوں کوچھوڑنے کے سانحات مسلمانوں سے زیادہ برادرانِ وطن کے مابین رونماہوتے ہیں اورملکی اعدادوشمارکے مطابق مسلمانوں میں طلاق کی شرح نہایت ہی معمولی ہے، مگرشاید بی جے پی کویوں لگتاہے کہ اس معاملے کواچھالنے سے انتخابات میں اسے فائدہ ہورہاہے (ممکن ہے اندرخانہ اس نے سروے وغیرہ بھی کروایاہو) اس لیے وہ گزشتہ دوسال کے عرصے سے اس پرخاص فوکس کیے ہوئی ہے، حال ہی میں سپریم کورٹ نے اس مسئلے پر ایک مقدمے کی سماعت کرتے ہوئے ایک مجلس کی تین طلاق کوسرے سے ناقابلِ عمل قراردیاتھا، یعنی اگرکوئی شخص ایک ساتھ تین طلاق دیتاہے، تووہ بالکل ہی نافذنہیں ہوں گی،ایک بھی نہیں،تب حکومت نے بھی کہاتھاکہ سپریم کورٹ کے فیصلے کے بعد وہ اپنے طورپرکوئی قانون سازی نہیں کرناچاہتی، پھر اب مسلم خواتین کے تحفظ کے زیرِ عنوان تین طلاق کوناقابلِ ضمانت جرم قراردینے والااورطلاق دینے والے کے لیے تین سال کی سزاتجویزکرنے والا یہ بل آخرکیوں پیش کیاگیا ہے؟ ویسے اس کی اطلاع تو مودی نے گجرات الیکشن کے دوران ہی ٹوئٹرکے ذریعے دے دی تھی کہ اگرکوئی شخص اپنی بیوی کو تین طلاق دے گا تواسے تین سال کی سزاہوگی ـ
آج پارلیمنٹ میں یہ بل پیش ہوا، حزبِ مخالف میں سے زیادہ ترممبران نے اس بل کو ملتوی کرنے، سٹینڈنگ کمیٹی کے حوالے کرنے اور اس کے اطراف وعواقب پرمکمل بحث ونقاش اور متعلقہ فریقوں سے بات چیت کے بعداسے پاس کرنے کی بات کی،بحث کے دوران آسام سے کانگریس کی ایم پی سمترا دیونے حکومت کواچھی طرح گھیرا، انھوں نے کانگریس کے موقف کی حمایت کرتے ہوئے موجودہ بل کے حوالے سے حکومت سے چھ اہم سوالات پوچھے کہ جب سپریم کورٹ نے پہلے ہی ایک نشست کی تین طلاق کوکالعدم قراردے دیاہے تواس پرجیل بھیجنے کاکیامطلب ہے؟اسی طرح جب شوہرجیل میں ہوگا تو اس کے بیوی بچے کاکیاہوگا؟سزاکے بعددونوں کی قانونی حیثیت میاں بیوی کی ہوگی یانہیں؟ تین سال جیل فرقہ وارانہ فسادپھیلانے، دوگروپوں میں نفرت وغیرہ کے جرم میں ہوتی ہے، کیاحکومت تین طلاق کواس کے برابرجرم مان رہی ہے؟ حکومت اس سے قبل میریٹل ریپ پرقانون بنانے سے اس لیے منع کرچکی ہے کہ اس سے بہت سے خانگی مسائل پیداہوجائیں گے، اب تین طلاق پرتین سال کی سزاکاقانون بنانے سے کوئی مسئلہ کھڑانہیں ہوگا؟ جس طرح تب قانون کے غلط استعمال کاخدشہ تھا، اسی طرح اب بھی ہے، مجلس اتحاد المسلمین کے سربراہ نے بھی زورداراندازمیں بحث میں حصہ لیا اور اس بل کی قانونی خامیوں کواجاگرکیا، بی جے پی کی ایم پی میناکشی لیکھی نے اس بل پربولنے کے دوران پورے مسلم پرسنل لا کو "ریفریش "کرنے کی بات کرتے ہوئے "مولویوں "کوخاص طورسے ریمانڈپرلیاـ
بہرکیف ان سب ڈراموں کے بعد یہ بل لوک سبھامیں پاس ہوچکاہے اوریہ ہوناہی تھاـ اس کے تمام پہلووں سے قطعِ نظر بی جے پی کااصل مقصدآنے والے انتخابات میں روایتی ووٹرس پراپنی گرفت برقراررکھنا اورحتی الامکان مسلمانوں (کم ازکم خواتین) میں کچھ نئے "امکانات "کی تلاش ہے، بابری مسجدکیس کی سماعت بھی دوتین ماہ تک کے لیے ٹال دی گئی ہے اورقوی امکان ہے کہ یہ ٹال مٹول کم ازکم 2019تک توجاری رہے گی، ادھرکل اورآج کے دن بھی تین طلاق کی آڑمیں مین سٹریم میڈیاسے دواہم خبریں اوجھل رہیں، ایک تو مشہورومعروف مالیگاؤں بم بلاسٹ کے ملزم کرنل پروہت اورسادھوی پرگیہ پرسے "مکوکا "کے ہٹنے کی خبرتھی اوردوسری بڑی خبریہ تھی کہ یوپی میں یوگی آدتیہ ناتھ کی سرکار نے خود یوگی اوردیگر چودہ نیتاؤں کے خلاف صوبے کے مختلف حصوں میں کیے گئے بیس ہزار مقدمات کوخارج کرنے کاحکم دے دیاہے، اس کی اطلاع خودیوگی نے یوپی اسمبلی میں دی ہے،یہ اعلان عین اس وقت کیاگیاہے، جب یوگی حکومت خود یوپی میں آرگنائزڈکرائم کے خلاف ایک قانون بنانے جارہی ہے،ان کاکہناہے کہ ان کے خلاف یہ کیسز سیاسی سازش کے تحت کیے گئے ہیں، اب خودہی وکیل، خودہی مدعاعلیہ اورخودہی منصف بھی ہیں، سووہ جوچاہیں کرسکتے ہیں ـ
یہ دونوں خبریں ایسی تھیں کہ انھیں قومی سطح پر ہیڈلائنزمیں آناچاہیے تھا، مگرمودی اینڈکمپنی نے میڈیاکوایسا موضوع تھمادیاکہ یہ خبریں بس سوشل میڈیا اورچند ایک اخباروں تک محدودہوکررہ گئیں ـ
جہاں تک تین طلاق بل کی بات ہے، تواسے پاس کرنے کی پوری پلاننگ پہلے سے تھی؛کیوں کہ حکومت کی غالب نمایندگی تو پارلیمنٹ میں ہے ہی، اس کے علاوہ اس نے چالاکی یہ بھی کی کہ کسی بھی متعلقہ(مسلم) گروپ کواس حساس مسئلے میں بات چیت کی دعوت نہیں دی، بورڈنے اس پر کچھ مستعدی دکھائی بھی، توبس میڈیاکی حدتک، وہ بھی ایک دودن پہلے ـ
بل پاس ہونے کے بعد سوشل میڈیاپرسرگرم مسلم نوجوانوں کی(عام طورپر)عجیب صورتِ حال ہے، میرے ہم نسل زیادہ تراحباب کے ری ایکشنزسے یوں لگ رہاہے گویاوہ اپناآپاکھوچکے ہیں، امت کے مجموعی شعوری انتشار وکشمکش کاصاف نمونہ ہم اپنے طرزِ عمل سے پیش کررہے ہیں، عام طورپرکسی بھی سماجی یاسیاسی معاملے میں ہمارے جذبوں کاابال اتناشدیدہوتاہے کہ کسی دوسرے آپشن یاسوچنے کے کسی اور طوروطرز کاوہم بھی نہیں ہوسکتا،یہ پورے برصغیرکے مسلمانوں کامعاملہ ہے، ماضی بعیدمیں اس خطے کے مسلمان ایسے تھے یانہیں، مجھے نہیں معلوم، مگر بیسویں صدی میں بعض خاص سیاسی مکاروں کے ذریعے مسلم سماج، معاشرت اورفکر کاغالب حصہ نری جذباتیت میں ڈھال دیاگیا، جس کے سحرسے پتانہیں ہم کب تک نکل سکیں گے ـ
فی الوقت ہمیں توبہرحال کسی کوہیرواورکسی کوزیروثابت کرنے میں اپنی توانائی صرف کرنے سے گریزکرناچاہیے کہ اس سے ہاتھ کچھ نہیں آناہے، البتہ ہمارے نمایندہ اداروں کوچاہیے کہ وہ آپس میں سرجوڑکر اور منتخب ماہرینِ قانون کی مددلے کر اس بل کا بھرپور جائزہ لیں اور قانونی طور پر اس بل کو چیلنج کیا جائے؛ کیوں کہ یہ ایک حقیقت ہے کہ یہ بل خامیوں کا پلندہ ہے اور اس سے بی جے کا مقصد صرف اور صرف سیاسی ”انٹریسٹ" حاصل کرنا ہے.
......................

ڈاکٹر تسلیم رحمانی کےفیس بک سے

Lok Sabha passes Muslim women (Protection of Marriage rights) Bill 2017 by Voice vote today . bill is full of lacuna and if passed by Rajya sabha and become an Act may be declared ultra virus by supreme Court of India constitution bench owing to  of time due to its own discrepancies. provided AIMPLB takes some expert technical and legal help . I suggest many organizations shall challenge the Act with different objections.
......
طلاق سے متعلق 
حکومت 
کا مجوزہ قانون
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1588652591192328&id=120477478009854
........
اے بی پی نیوز ویڈیو کلپ؛ 
ABP News Video Clip;
لوک سبھا میں 
طلاق ثلاثہ بل پر اسدالدین اویسی نے 
کی زوردار تقریر...
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1884152481626716&id=194131587295489
....

Wednesday, 27 December 2017

آدمیت، احترام آدمی... باخبر شو، از مقام آدمی

آدمیت، احترام آدمی
باخبر شو، از مقام آدمی

اقبال
(آ دمیت آدمی کے احترام کا نام ہے، اس مقام آدمی سے باخبر رہو ۔)
جسے انسانیت اور آدمیت کا احترام معلوم نہیں۔ وہ انسان نما حیوان ہے:
جہل خرد نے یہ دن دکھائے
گھٹ گئے انساں، بڑھ گئے سائے

جگر مرادآبادی
اسلام نے اپنے پیرو کاروں کو بلاتفریق مذہب وملت درج ذیل بنیادی انسانی حقوق کے تحفظ کا ذمہ دار بنایا ہے:
1۔۔انسانیت کا احترام
2۔۔انسانی جان کا تحفظ
3۔۔انسانی مال کا تحفظ
4۔۔انسانی عزت وآبرو کا تحفظ
5۔۔۔مذہب اور آزادی رائے کا تحفظ
6۔۔۔ضروریات زندگی کا انتظام وتکفل
7۔۔۔ناموس خواتین کا تحفظ ۔
یہی حقوق انسانی کا اسلامی منشور ہے

شکیل منصور القاسمی

Tuesday, 26 December 2017

تین طلاق مخالف قانون؛ وزیر اعظم کو مولانا رابع حسنی ندوی کے خط

آل انڈیا مسلم پرسنل لا بورڈ اور مسلم خواتین کی حقیقی
نمائندہ تنظیموں سے مشورہ کے بغیر کوئی قانون سازی نہ کی جائے
وزیر اعظم نریندر مودی کے نام مولانا رابع حسنی ندوی کے خط کا متن
لکھنو۔ ۲۶؍دسمبر: ٹرپل طلاق مخالف قانون کو لے کر مسلمانوں میں جو بے چینی پھیلی ہوئی ہے اس کے پیش نظر دو روز قبل لکھنو میں مسلم پرسنل لا بورڈ کا ایک اجلاس منعقد ہوا جس میں موجودہ صورتحال پر غوروخوض کیا گیا. اجلاس میں منظور تجاویز کے پیش نظر مولانا سید رابع حسنی ندوی صدر آل انڈیا مسلم پرسنل لا بورڈ نے وزیر اعظم نریندر مودی کو ایک خط لکھا جس کا متن حسب ذیل ہے۔
بخدمت جناب نریندر مودی صاحب
وزیر اعظم ہند
نئی دلی
جناب عالی،
مسلم خواتین (شادی کے حقوق کا تحفظ) بل ۲۰۱۷ کے تعلق سے آل انڈیا مسلم پرسنل لا بورڈ کی مجلس عاملہ کے ذریعہ لئے گئے فیصلہ کی طرف میں آپ کی توجہ مبذول کروانا چاہتا ہوں. مسلم پرسنل لا بورڈ کی مجلس عاملہ میں ہونے والی گفتگو اور فیصلوں کا خلا صہ درج ذیل ہے:-
1.آل انڈیا مسلم پرسنل لا بورڈ نے مذکورہ بل کی مختلف دفعات کا جائزہ لیا اور یہ محسوس کیا گیا کہ:
I.مجوزہ بل کے نتائج بالعموم  مسلم خواتین کے مفاد کے خلاف ہیں اور مطلقہ خواتین اور ان کے خاندان کے لئے  نقصان کا باعث  ہے .یہ شریعت کے اصولوں کے بھی خلاف ہے اور مسلم پرسنل لا میں مداخلت ہے۔
II.بل کی مجوزہ دفعات  دوسرے جاریہ قوانین میں دی گئی قانونی دفعات کے بھی خلاف ہیں لہذا غیر ضروری ہیں . گھریلو تشدد سے متعلق قانون ٢٠٠٥ اورگارجین شپ اینڈ وارڈس ایکٹ  اور مجموعہ ضابطۂ فوجداری (Cr.P.C) پہلے سے موجود ہیں۔
III. مجوزہ بل میں درج  احکامات  ،مذہبی اکائیوں کو آئین ہند میں فراہم کی گئی ضمانتوں میں بھی مداخلت ہیں۔
IV. یہ  عدالت عظمی کے  ٢٢ اگست ٢٠١٧ کے فیصلہ کی روح کے بھی خلاف ہے۔
2. اپنے نقطۂ نظر کی وضاحت کے لئے ہم بل کی چند قابل اعتراض دفعات  کا ذیل میں حوالہ دیتے  ہیں :
    (a.) دفعہ ٢ میں لفظ  طلاق کی دی  گئی تعریف،  طلاق بدعت  سے تجاوز کرتی ہے جبکہ، عزت مآب عدالت عظمی نے صرف طلاق بدعت کو ہی مسترد کیا تھا ، . مجوزہ تعریف طلاق بائن وغیرہ  کو بھی شامل کر سکتی ہے، جس کو عدالت عظمی نے غیر قانونی قرار نہیں دیا ہے ،مگر،طلاق بائن کوبل کی دفعہ (b)2 میں استعمال کے گئے الفاظ    یا طلاق کی کوئی اور مماثل شکل جس سے فوری اور غیر رجعی طور پر طلاق واقع ہوتی ہو کے معنی میں شامل ماننے سے بل کی دفعہ (b)2.مع دفعہ 3 کا اثر طلاق بائن وغیرہ کو بھی باطل اور غیر قانونی قرار دینا  ہوسکتا ہے۔
(b) طلاق بدعت کے غیر مؤثرعمل کو جسے عدالت عظمی کے ذریعہ غیرقانونی قرار دیدیا گیا ہے اور جو کہ ٢٢ اگست ٢٠١٧ عدالت عظمی کے فیصلہ کے ذریعہ صحیح تسلیم نہیں کیا گیا ہے اس کو بل کی دفعہ ٤ کے ذریعہ سنگین قسم کے تعزیری جرم میں تبدیل کر دیا گیا ہے، جس کے لئے ٣  سال تک کی سخت سزائے قید کا دینا عورت اور اس کے بچوں کو نفقہ سے مکمل طور پر محروم کرنے کا سبب بن سکتا ہے. لہذا اس کو کسی بھی طرح عورت اور اس کے بچوں کے مفاد میں نہیں کہا جاسکتا ہے۔
(c) اس طرح کی تمام مطلقہ عورتوں کو نابالغ بچوں کی حضانت )custody) دئے جانے کا قانون میں، بچے کی فلاح وبہبود  کے بنیادی اصول کو مد نظر نہیں رکھا گیا ہے اور اس سلسلہ میں شاہ بانو کے مقدمہ کو بھی ملحوظ نہیں رکھا گیا ہے۔
(d) مجموعہ ضابطۂ فوجداری (Cr.P.C) کو نافذ کرتے وقت بدکاری (adultory) کے تعلق سے موجودہ قانون کو مد نظر نہیں رکھا گیا ہے  اور اس طرح کا مقدمہ کسی تیسرے کے اقدام پر متا ثرہ عورت کی مرضی کے خلاف بھی کیا جاسکتا ہے جس کا کہ خود اس عورت پر منفی اثر پڑیگا۔
3. بل کا مسودہ تیار کرتے وقت قانون سازی کے پارلیمانی طریقہ کو بھی نہیں اپنایا گیا ہے. متعلقین / متاثرہ فریقوں /خواتین کی تنظیموں سے، غیر موثر طلاق  کے سلسلہ میں قانون سازوں کے سامنے حقیقی صورتحال اور مجوزہ قانون کے منفی اثرات اور عورتوں اور بچوں کی فلاح وبہبود کو پیش کرنے کے لئے مشورہ نہیں کیا گیا۔
4. مذکورہ امور کے پیش نظر، آل انڈیا مسلم پرسنل لا بورڈ ،مرکزی حکومت سے اصرار کرتا ہے کہ موجودہ بل کو پارلیمنٹ میں پیش نہ کرے اور اگر حکومت اس طرح کا قانون بنانا ضروری سمجھتی ہے تو حکومت آل انڈیا مسلم پرسنل لا بورڈ اور مسلم خواتین کی حقیقی نمائندہ تنظیموں وغیرہ سے لازمی طور پر مشورہ کرے اور صرف اسی صورت میں، آئینی ضمانتوں اور عدالت عظمی کے فیصلہ  ٢٢.اگست ٢٠١٧  کی روشنی میں بل تیار کیا جائے۔
5. چونکہ مجوزہ قانون تمام مسلمانوں کو متأثر کرے گا، اور اس کا اثر مسلم خواتین اور بچوں پر منفی  پڑے گا اور یہ آئین ہند کی دفعہ 25 میں فراہم کردہ حقوق اور بنیادی حق مساوات میں مداخلت ہے، اس لئے آل انڈیا مسلم پرسنل لا بورڈ اس بل کی ہر سطح پر مخالفت کریگا اور عوام میں بیداری پیدا کرے گا۔
لہذا، آپ سے گذارش ہے کہ اس بل کو آگے نہ بڑھائیں بلکہ اس بل  کو واپس لے لیں اور اگر آپ کی حکومت اس سلسلہ میں قانون سازی کو ضروری خیال کرتی ہے تو آل انڈیا مسلم پرسنل لا بورڈ اور ان  مسلم خواتین تنظیموں سے جو مسلم عورتوں کی حقیقی نمائندہ ہیں، لازمی طور پر مشورہ کیا جانا چاہئے۔
شکریہ ۔
بہترین خواہشات کے ساتھ ،
سید محمد رابع حسنی ندوی
صدر
۲۵؍دسمبر،۲۰۱۷