Monday, 10 August 2020

ای ‏کوڈ کیا ہے ‏ E Code क्या हैं

E Code क्या हैं? 
शाकाहारियों को किन E Codes की जानकारी होनी जरूरी है जो पैकेटबंद उत्पादों पर लिखी होती है?
E Code क्या हैं? शाकाहारियों को किन E Codes की जानकारी होनी जरूरी है जो पैकेटबंद उत्पादों पर लिखी होती है?
1 जवाब

Susheel Thakur, Airport Employee (2014 से - अभी तक)
June 14, 2019 को अपडेट किया गया · लेखक के 287 जवाब हैं और जवाबों को 10.6 लाख बार देखा गया है
जय गुरु देव #Be Vegetarian

इन्टरनेट पर दस्तावेज़ों की भरमार है। असंख्य पृष्ठों में न जाने क्या-क्या लिखा गया है, सही भी गलत भी। बहुत सा गलत अज्ञानवश है तो बहुत सारा बदनीयती के साथ भी। न तो हम हर बात को पढ़ सकते हैं और न ही सारे कथनों की जांच की जा सकती है। फिर भी हम सब अपने अपने हिस्से की इतनी ज़िम्मेदारी तो निबाह सकते हैं कि अप्रमाणित जानकारी को कॉपी-पेस्ट करने से बचें। बात की तह में जाकर उसकी असलियत जानने का प्रयास करें। यहाँ, निरामिष ब्लॉग पर हमारी कोशिश यही है कि शाकाहार और अहिंसा से संबन्धित प्रामाणिक जानकारी प्रस्तुत की जाय और शाकाहार संबन्धित भ्रमों का अचूक निवारण किया जाय।

इन्टरनेट के कॉपी-पेस्ट विशेषज्ञों ने विभिन्न शाकाहारी पदार्थों में पशु-वसा होने के बारे में एक बड़ा भ्रम फैला रखा है। एक दूसरे से कॉपी पेस्ट किए गए हजारों वेबपृष्ठों में ऐसा बताया जा रहा है कि किसी भी उत्पाद की सामग्री सूची में यदि अंग्रेज़ी के E अक्षर से आरंभ होने वाली कोई संख्या लिखी है तो इसका अर्थ यह हुआ कि उस पदार्थ में सुअर की चर्बी मिली है। ऐसा प्रचार विशेषकर अमेरिका और यूरोप आधारित बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उत्पादों के बारे में हो रहा है।

उदाहरण के लिए, ऐसी एक पोस्ट पर बताया गया है कि

जहां भी किसी पदार्थ पर लिखा दिखे
E100, E110, E120, E 140, E141, E153, E210, E213, E214, E216, E234, E252,E270, E280, E325, E326, E327, E334, E335, E336, E337, E422, E430, E431, E432, E433, E434, E435, E436, E440, E470, E471, E472, E473, E474, E475,E476, E477, E478, E481, E482, E483, E491, E492, E493, E494, E495, E542,E570, E572, E631, E635, E904 समझ लीजिए कि उसमे सूअर की चर्बी है।

मुख्य मुद्दे पर आने से पहले विषय से संबन्धित कुछ सामान्य जानकारी:
उत्पादों पर छपे ई संख्या (E number) का उद्देश्य उपभोक्ता को उत्पाद में प्रयुक्त सामग्री की सूची प्रदान करना है। यदि उद्देश्य सामग्री की जानकारी छिपाने का होता तो ई संख्या या किसी भी कोड की ज़रूरत नहीं होती। ई संख्या की शुरुआत अमेरिका के भोजन व औषधि प्रशासन संस्थान अर्थात The U. S. Food and Drug Administration (संक्षेप में FDA या एफडीए) द्वारा हुई। एफडीए ने भोज्य पदार्थों में प्रयुक्त सामग्री की सूची तैयार करके जटिल रसायनों को कूटनाम (code names) दे दिये ताकि भोजन, पंसारी, चिकित्सा तथा औषधि व्यवसाय पर कानूनी नज़र रखी जा सके और सामान खरीदने वालों को इस बात की पूरी जानकारी रहे कि वे क्या खा-पी रहे हैं और साथ ही किसी खाद्य पदार्थ के किसी दुष्प्रभाव या एलर्जी आदि की कोई जानकारी प्रकाश में आती है तो उसे जनता तक बखूबी पहुंचाया जा सके और हानिकर पदार्थों को नियंत्रित किया जा सके। यह सारी प्रक्रिया दरअसल, विकसित देशों के उन क़ानूनों का हिस्सा हैं जिनके द्वारा जनता के स्वास्थ्य की देखरेख की जाती है।

ई संख्या द्वारा प्रदर्शित अधिकांश रसायन सामान्य जीवन में प्रयुक्त होने वाले नहीं हैं और उनके जटिल नाम जानना, लिखना, पढ़ना या समझना हम-आप जैसे सामान्यजन के लिए कठिन होता। ई संख्या द्वारा मानकीकरण का एक उद्देश्य इस जटिलता को दूर करना भी है।

बिना जाने हुए हर ई संख्या को सुअर की चर्बी समझने से पहले हमें यह तो सोचना चाहिये कि जिसे जानकारी छिपानी होती वह ईकोड लिखता ही नहीं। वैसे भी यदि सुअर की चर्बी को धोखे से आपके भोजन में डालना होता तो एक नाम ही काफी था इतनी सारी ई-संख्याओं की ज़रूरत नहीं थी। हाँ यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि इन रसायनों में से अनेक का स्रोत जैविक हो सकता है। उनसे अवश्य बचा जाय लेकिन आँख मूंदकर सबको सुअर की चर्बी कहना सही नहीं है। आइये देखें, उपरोक्त उदाहरण में दर्शाई गई कुछ ई संख्याओं की हक़ीक़त:

कूट

नाम

उपयोग

स्रोत

E100

करक्यूमिन

पीला रंग

हल्दी

E110

सनसेट यलो (चेतावनी/प्रतिबंधित)

पीला रंग

पेट्रोलियम

E120

कारमिनिक एसिड

लाल रंग

कोचीनील नामक एक कीड़ा (शाकाहारी नहीं)

E140

क्लोरोफिल

हरा रंग

वनस्पति स्रोत

E141

क्लोरोफिल के ताम्र यौगिक

हरा रंग

वनस्पति स्रोत

E153

ब्रिलिएंट ब्लैक (सीमित/चेतावनी)

काला रंग

प्रयोगशाला

E210

बेंज़ोइक एसिड

संरक्षक(preservative)

वनस्पति गोंद

E213

केल्शियम बेंज़ोएट

संरक्षक(preservative)

वनस्पति गोंद

E214

इथाइल पैराबेन

संरक्षक(preservative)

4-Hydroxybenzoic acid, वनस्पति गोंद व अल्कोहल

E216

प्रोपाइल पैराबेन

संरक्षक(preservative)

प्रयोगशाला; मुख्यतः वनस्पति गोंद; कुछ कीड़ों में भी पाया जाता है

E234

नाइसिन

संरक्षक(preservative)

प्रयोगशाला; दुग्ध; खमीरीकरण

E252

पोटेशियम नाइट्रेट

संरक्षक(preservative)

एक खनिज लवण

E270

लैक्टिक एसिड

संरक्षक(preservative)

प्रयोगशाला; दुग्ध,शर्करा

खाद्य पदार्थों के ई संख्या आधारित अंधविरोध में सच कम झूठ अधिक है। इन सारे प्रचार का आरंभ इस्लामी अतिवादियों द्वारा अमेरिकी कंपनियों के आर्थिक बहिष्कार के उद्देश्य से हुआ था। सबसे पहले कोका कोला के सीक्रेट फार्मूले मे सूअर की चर्बी का प्रचार किया गया। सऊदी अरब से लेकर पाकिस्तान तक फैले इस प्रचार में धीरे-धीरे समझ न आने वाला हर रसायन सूअर की चर्बी बताया जाने लगा। सुअर से मुसलमानों की धार्मिक अस्पृश्यता के मद्देनजर यह बात स्पष्ट है कि इस प्रचार में सुअर की चर्बी का उल्लेख प्रमुखता से हुआ। अतिवादी मुल्लों की देखादेखी न जाने कब हमारे जोशीले भारतीय भी आँख मूंदकर इस प्रचार में कूद गए। स्वतंत्र जोशीलों के साथ इस प्रचार में स्वदेशी आंदोलन जैसे कार्यकर्ताओं का भी प्रभाव रहा।
--------------------------------------------------


 - Quora @MIUI| https://hi.quora.com/E-Code-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%88%E0%A4%82-%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%8B

راتوں ‏کو ‏جاگ ‏کر ‏دن ‏میں ‏سونے ‏والی ‏قوم

راتوں کو جاگ کر دن میں سونے والی قوم
بہادر شاہ ظفر کے سارے شہزادوں کے سر قلم کرکے اس کے سامنے کیوں پیش کئے گئے؟ 
قبر کیلئے زمین کی جگہ کیوں نہ ملی؟ 
 آج بھی اس کی نسل کے بچے کھچے لوگ بھیک مانگتے پھرتے ہیں 
 کیوں؟ 
پڑھیں اور اپنی نسل کو بھی بتائیں 
تباہی 1 دن میں نہیں آجاتی
صبح تاخیر سے بیدار ہو نے والے افراد درج ذیل تحریر کو غور سے پڑھیں
زمانہ 1850ء کے لگ بھگ کا ہے مقام دلی ہے
وقت صبح کے ساڑھے تین بجے کا ہے سول لائن میں بگل بج اٹھا ہے
پچاس سالہ کپتان رابرٹ اور اٹھارہ سالہ لیفٹیننٹ ہینری دونوں ڈرل کیلئے جاگ گئے ہیں
دو گھنٹے بعد طلوع آفتاب کے وقت انگریز سویلین بھی بیدار ہوکر ورزش کررہے ہیں
انگریز عورتیں گھڑسواری کو نکل گئی ہیں ۔۔۔ سات بجے انگریز مجسٹریٹ دفتروں میں اپنی اپنی کرسیوں پر بیٹھ چکے ہیں
ایسٹ انڈیا کمپنی کا سفیر سر تھامس مٹکاف دوپہر تک کام کا اکثر حصہ ختم کرچکا ہے
کوتوالی اور شاہی دربار کے خطوں کا جواب دیا جاچکا ہے
 بہادر شاہ ظفر کے تازہ ترین حالات کا تجزیہ آگرہ اور کلکتہ بھیج دیا گیا ہے
دن کے ایک بجےسر مٹکاف بگھی پر سوار ہوکر وقفہ کرنے کیلئے گھر کی طرف چل پڑا ہے.
 یہ ہے وہ وقت جب لال قلعہ کے شاہی محل میں ''صبح''  کی چہل پہل شروع ہورہی ہے
 ظل الہی کے محل میں صبح صادق کے وقت مشاعرہ ختم ہوا تھا جس کے بعد ظلِ الٰہی اور عمائدین خواب گاہوں کو گئے تھے، اب کنیزیں نقرئی برتن میں ظلِ الٰہی کا منہ ہاتھ دھلا رہی ہیں اور تولیہ بردار ماہ جبینیں چہرہ، پاؤں اور شاہی ناک صاف کر رہی ہیں اور حکیم چمن لال شاہی پائے مبارک کے تلووں پر روغن زیتون مل رہا ہے!
اس حقیقت کا دستاویزی ثبوت موجود ہے کہ لال قلعہ میں ناشتے کا وقت اور دہلی کے برطانوی حصے میں دوپہر کے لنچ کا وقت ایک ہی تھا.
دو ہزار سے زائد شہزادوں کا بٹیربازی، مرغ بازی، کبوتر بازی اور مینڈھوں کی لڑائی کا وقت بھی وہی تھا،
اب ایک سو سال یا ڈیڑھ سو سال پیچھے چلتے ہیں
برطانیہ سے نوجوان انگریز کلکتہ، ہگلی اور مدراس کی بندرگاہوں پر اترتے ہیں برسات کا موسم ہے مچھر ہیں اور پانی ہے ملیریا سے اوسط دو انگریز روزانہ مرتے ہیں لیکن ایک شخص بھی اس ''مرگ آباد'' سے واپس نہیں جاتا.
لارڈ کلائیو پہرول گھوڑے کی پیٹھ پر سوار رہتا ہے
اب 2018 ء میں آتے ہیں
 پچانوے فیصد سے زیادہ امریکی رات کا کھانا سات بجے تک کھالیتے ہیں
آٹھ بجے تک بستر میں ہوتے ہیں اور صبح پانچ بجے سے پہلے بیدار ہوجاتے ہیں
 بڑے سے بڑا ڈاکٹر چھ بجے صبح اسپتال میں موجود ہوتا ہے. پورے یوروپ امریکہ جاپان آسٹریلیا اور سنگا پور میں کوئی دفتر، کارخانہ، ادارہ، اسپتال ایسا نہیں جہاں اگر ڈیوٹی کا وقت نو بجے ہے تو لوگ ساڑھے نو بجے آئیں!
آج کل چین دنیا کی دوسری بڑی طاقت بن چکی ہے پوری قوم صبح چھ سے سات بجے ناشتہ اور دوپہر ساڑھے گیارہ بجے لنچ اور شام سات بجے تک ڈنر کرچکی ہوتی ہے.
اللہ کی سنت کسی کیلئے نہیں بدلتی. اس کا کوئی رشتہ دار نہیں نہ اس نے نہ کسی کو جنا، نہ کسی نے اس کو جنا جو محنت کرے گا تو وہ کامیاب ہوگا ۔۔۔ عیسائی ورکر تھامسن میٹکاف سات بجے دفتر پہنچ جائے گا تو دوسری جانب دن کے ایک بجے تولیہ بردار کنیزوں سے چہرہ صاف کروانے والا، بہادر شاہ ظفر مسلمان بادشاہ ہی کیوں نہ ہو' ناکام رہے گا.
بدر میں فرشتے نصرت کیلئے اتارے گئے تھے لیکن اس سے پہلے مسلمان پانی کے چشموں پر قبضہ کرچکے تھے جو آسان کام نہیں تھا اور خدا کے رسول صلی اللہ علیہ وسلم رات بھر پالیسی بناتے رہے اور رات کے باقی بچے ہوئے حصہ میں سجدے میں پڑے رب ذوالجلال سے امداد و استعانت طلب کرتے رہے!
کیا اس قوم کی بکھری باقیات کو برصغیر میں پھر سے تباہ وبرباد ہونے سے دنیا کی کوئی طاقت بچاسکتی ہے ۔۔۔ جس میں کسی کو اس لئے مسند پر  بٹھایا جاسکتا ہے کہ وہ دوپہر سے پہلے اٹھتا ہی نہیں، اور کوئی اس پر فخر کرتا ہے کہ وہ دوپہر کو اٹھتا ہے لیکن سہ پہر تک ریموٹ کنٹرول کھلونوں سے دل بہلاتا ہے، جبکہ کچھ کو اس بات پر فخر ہے کہ وہ دوپہر کے تین بجے اٹھتے ہیں،
 کیا اس معاشرے کی اخلاقی پستی کی کوئی حد باقی ہے.
جو بھی کام آپ دوپہر کو زوال کے وقت شروع کریں گے وہ زوال ہی کی طرف جائے گا. کبھی بھی اس میں برکت اور ترقی نہیں ہوگی.
اور یہ نہ سوچا کریں کے میں صبح صبح اٹھ کر کام پر جاؤں گا تو اس وقت لوگ سو رہے ہوں گے میرے پاس گاہک کدھر سے آئے گا. گاہک اور رزق اللہ رب العزت بھیجتا ہے. 
امتحان کی رات بھر جاگنا تباہ کن کیوں؟
بہت سے طلبہ امتحان سے پہلے پوری پوری رات جاگ کر تیاری میں گزارتے ہیں وہ سمجھتے ہیں کہ یہ ان کے علم میں اضافے کا باعث بنے گا۔ لیکن برطانیہ کے رائل ہالو وے یونیورسٹی میں سائیکالوجی کے پروفیسر جیکی کے مطابق یہ اس صورتحال میں کرنے والا بدترین کام ہے۔
ننید انسانی یادداشت پر کس طرح اثر انداز ہوتی ہے، خاص طور پر ہم زبان کو کیسے یاد رکھ پاتے ہیں۔ تمینن اسی شعبے کے ماہر ہیں۔
سونے کی عادت سیکھنا بچوں کے لیے پسندیدہ خیال ہوسکتا ہے اس امید کے ساتھ کہ وہ ساتھ زبان بھی سیکھیں۔ یہ روایت کہ سوتے ہوئے زبان سیکھنے کے متعلق ریکارڈنگ سننے سے آپ کے دماغ پر نقش چھوڑ جاتی ہے اور جب آپ اٹھتے ہیں تو وہ قدیم زبان بولنے کے قابل ہوسکتے ہیں۔
لیکن علم کو دماغ کے اندر رکھنے کے لیے بھی نیند کی ضرورت ہوتی ہے۔ اس سلسلے میں تمینن اور دیگر محققین کی جانب سے کی جانے والی تحقیق نے بتایا ہے کہ یہ سب کیوں ضروری ہے یعنی نیند۔
تمینن کی تحقیق ابھی جاری ہے جس میں شرکا کو نئے الفاظ سکھائے جاتے ہیں اور پھر ان کو پوری رات جاگنے کو کہا جاتا ہے۔
تمینن نے اس حوالے سے کچھ دن اور پھر کچھ ہفتے کے بعد یہ دیکھا کہ کیا انھیں وہ الفاظ اب بھی یاد ہیں۔
بہت سی راتوں کے بعد نیند پوری ہونے کے عمل سے گزرنے کے بعد انھوں نے دیکھا کہ انھوں نے کتنی جلدی ان الفاظ کو یاد کرلیا اس گروپ کے مقابلے میں جو نیند کی کمی کا شکار تھا۔
وہ کہتے ہیں کہ نیند واقعی ہی سیکھنے کا مرکز ہے۔
'اگر آپ پڑھائی نہیں بھی کررہے تو بھی جب آپ سو رہے ہوتے ہیں تو آپ کا دماغ مسلسل پڑھ رہا ہوتا ہے۔ یہ ایسے ہی ہے جیسے وہ آپ کی جگہ کام کر رہا ہے۔ آپ اگر سوئئں گے نہیں تو اپنی پڑھائی پر صرف کیے جانے والی وقت سے کچھ بھی حاصل نہیں کر سکیں گے۔'
تمینن کی سونے کے لیے مختص تجربہ گاہ کے کمرہ نمبر ایک کی تزئین و آرائش بہت اچھی کی گئی تھی۔ وہاں تتلیوں کی تصاویر کی فریم اور رنگ برنگی غالیچے رکھے ہوئے تھے۔
وہاں موجود بستر کے اوپر ایک چھوٹی سی ای ای جی مشین لگی ہوئی تھی۔ جس کامقصد مریض کے دماغ میں ہونے والے عوامل کا باریک بینی سے جائزہ لینا ہے۔ اس کے لیے وہاں ان کے سروں پر الیکٹروڈز موجود ہوتے ہیں۔ یہ دماغ کے سامنے والا، سائڈ والا اور اندرونی حصہ مانیٹر کرتا ہے بلکہ مسلز کی نقل و حرکت اور آنکھوں کے ہلنے تک کو ریکارڈ کرتا ہے۔
خواب اصل میں دن کے وقت جو کچھ ہو رہا ہوتا ہے اس کا ری پلے ہی ہوتے ہیں۔ ریسرچ کے مطابق دماغ کا وہ حصہ جو منطق سے جڑا ہوتا ہے اور جذبات سے وہ نیند کے دوران مختلف طرح سے کام کرتا ہے۔ جو بچے دوسری زبان سیکھ رہے ہوتے ہیں سوتے میں ان کی آنکھوں کی پتلیاں زیادہ حرکت کرتی ہیں۔ یوں انھیں زیادہ ٹائم ملتا ہے۔ اس مواد کو ضم کرنے میں جو انھوں نے سیکھا۔
ہمارے اندر موروثی طور پر ایک گھڑیال ہوتا ہے جو ہمیں بتاتا ہے کہ کب سونا ہے اور کب جاگنا ہے۔
یہ بھی کہا جاتا ہے کہ جس شخص کا طرز زندگی عام سے مختلف ہو، ماحول یا موروثی طور پر وہ بے خوابی کا شکار ہو تو سب سے پہلا کام جو وہ کر سکتا ہے گہرے رنگ کے پردوں کا استعمال کرے یا دن کے وقت زیادہ روشنی میں رہے۔
تمینن کی حالیہ تحقیق میں سلو ویو سلیپ پر بات کی گئی ہے جسے عرف عام میں گہری نیند کہتے ہیں۔ یہ یاداشت بنانے اور اسے محفوظ رکھنے میں اہم کردار ادا کرتی ہے چاہے وہ گرامر سے متعلق ہو، الفاظ کے ذخیرے سے یا کوئی اور معلومات ہوں۔ یہاں دماغ کے مختلف حصوں کا آپس میں رابطہ بہت اہم ہے۔
گہری نیند کے دوران ہوتا یہ ہے کہ ہمارے دماغ کا جو حصہ ہیپیکمپوس کہلاتا ہے وہ شاید ابتدائی طور پر اس دن سیکھنے والے الفاظ کو ان کوڈ کرتے ہیں۔ ایسے میں دماغ کے مختلف حصوں کا آپس میں رابطہ بہت اہم ہوتا ہے۔
گہری نیند کے دوران ہیپی کیمپس جو کہ جلد سیکھنے کی صلاحیت رکھتا ہے وہ نیو کورٹیکس سے رابطہ کرتا ہے اور اسے لمبے عرصے کے لیے معلومات کو یاد رکھنے کے لیے مستحکم کرتا ہے۔
بالغوں کی تعلیم کے لیے روزانہ نظموں کی دوہرائی کا تو سوال ہی پیدا نہیں ہوتا لیکن ہاں بچپن میں اس کی خاص اہمیت ہوتی ہے۔ بچوں کی نیند بڑوں کی نسبت گہری ہوتی ہے اور اس وجہ سے شاید اس نکتے کی وضاحت ہوتی ہے کہ بچے زبان اور دیگر امور جلدی سیکھتے ہیں۔
جرمنی کی یونیورسٹی میں یہ تحقیق کی گئی کہ نیند بچے کی سیکھنے کی استعداد میں کیا کردار ادا کرتی ہے۔ محققین نے یہ مانیٹر کیا کہ نید کے دورانبچے کے دماغ میں کیا ہوتا ہے۔ اور یہ بھی کہ نیند سے پہلے سیکھی جانے والی چیزیں جاگنے کے بعد کتنی حد تک یاد رہ جاتی ہیں۔
جن افراد کو وروثی طور پر یا طرززندگی کی وجہ سے گہری نیند نہ آتی ہو انھیں کچھ احتیاطی تدابیر اپنا لینی چاہیے
یہ معلوم ہوا کہ نیند بچے کو مکمل علم میں مدد دیتی ہے یعنی یہ اس کی یاداشت کو باضابطہ طور پر بننے اور اسے تشریحی یاداشت بنانے میں مدد دیتی ہے۔
بالغ افراد بھی سیکھی گئی معلومات کو نیند کے بعد دوہراسکتے ہیں لیکن محقق کیتھرینہ زینکی کا کہنا ہے 'نیند بچوں میں زیادہ پراثر انداز میں اثر چھوڑتی ہے۔'
ڈومنکی پیٹٹ کینیڈین سلیپ اینڈ سرکیڈین نیٹ ورک میں کوارڈنیٹر ہیں۔ وہ کہتی ہیں کہ بچوں کو دن کے وقت سونے کی ضرورت ہوتی ہے تاکہ ان کا دماغ سب کچھ سیکھ سکے۔
لڑکپن میں بچوں کے لیے دن کو سونا ان میں زبان سیکھنے کی صلاحیت کے حوالے سے بہت اہم ہوتا ہے۔
وہ کہتی ہیں کہ نیند دماغ کو متحرک کرتی ہے اور اس میں معلومات کو محفوظ کرتی ہے اس کے علاوہ یہ ضرورت کے وقت معلومات کو دماغ سے نکالنے یعنی استعمال میں لانے میں بھی مدد کرتی ہے۔
یہ بھی واضح کیا گیا ہے کہ بچوں میں اور بالغوں میں بھی لمبی نیند سستی کی علامت نہیں ہوتی۔
رات کو بہتر نیند کے لیے یہ چھ باتیں آزمائیے:
ایلیکس تھیریئن
ماہرین کے مطابق کئی ایسے کام ہیں جو ہم انجانے میں کرتے چلے جاتے ہیں۔ ہمیں احساس نہیں ہوتا کہ وہ ہماری نیند کو کس حد تک متاثر کرتے ہیں۔
نیند پوری نہ ہونے یا ہمارے جسم کے اندر کی گھڑی یعنی باڈی کلاک متاثر ہونے سے ہم ڈیپریشن اور بائی پولر ڈس آرڈر جیسے امراض کی زد میں بھی آ سکتے ہیں۔ اس لیے اچھی نیند کی ضرورت کو سمجھنا بہت اہم ہے۔
سوال یہ ہے کہ ایسا کیا کیا جائے کہ نیند میں خلل نہ پڑے۔
شام کو روشنی کی حد مقرر کیجیے:
موبائل فون اور لیپ ٹاپ کا استعمال ان دنوں نشے کی طرح عام ہو رہا ہے۔ متعدد افراد تو لیپ ٹاپ پر گھنٹوں ڈرامے اور فلمیں دیکھتے رہتے ہیں لیکن کم ہی جانتے ہیں کہ ایسا کرنے سے ہماری نیند بری طرح متاثر ہوتی ہے۔
یہ الیکٹرانک آلات ایک خاص طرح کی طاقتور نیلی روشنی چھوڑتے ہیں۔ اس روشنی کی وجہ سے جسم میں میلاٹونن ہارمون ٹھیک سے نہیں چھوٹ پاتا ہے۔ یہ وہ ہارمون ہے جو نیند کے لیے ذمہ دار ہے۔
سرے یونیورسٹی کے پروفیسر میلکم فون شانتز کا مشورہ ہے کہ سونے سے ڈیڑھ گھنٹہ پہلے ان آلات کا استعمال بند کر دینا چاہیے۔
نیلی روشنی کے علاوہ شام کو گھر میں، خاص طور پر سونے والے کمرے میں روشنی کے دیگر ذرائع بھی کم کر دینے چاہییں. ایسا لیمپ کی مدد سے کیا جاسکتا ہے۔ سونے کے کمرے میں اندھیرا کرنے کے لیے گہرے رنگ والے پردے بھی لگائے جاسکتے ہیں۔
وقت کے پابند رہیے:
اختتامِ ہفتہ سے پہلے والی رات دیر تک جاگنے کا دل تو بہت کرتا ہے لیکن اچھی نیند برقرار رکھنے کے لیے وقت کی پابندی ضروری ہے۔
ہر روز ایک ہی وقت پر سونا مددگار ثابت ہوتا ہے۔ روز سونے کے وقت میں جتنی زیادہ تبدیلی ہو گی صحت کو اتنا ہی زیادہ خطرہ ہوگا۔
خواب گاہ آرام دہ ہو:
بستر کے ارد گرد لیپ ٹاپ اور چارجر کے علاوہ دیگر سامان کا بکھرا رہنا کئی لوگوں کے لیے عام بات ہے لیکن اگر ہم اچھی نیند سونا چاہتے ہیں تو یہ سمجھنا بہت ضروری ہے کہ آپ کا سونے کا کمرا جتنا آرام دہ ہوگا نیند اتنی ہی اچھی آئے گی۔
بہتر یہ ہوتا ہے کہ فون، لیپ ٹاپ اور دیگر الیکٹرانک عالات دوسرے کمرے میں رکھے جائیں۔ فون میں الارم لگانے کی بجائے ایک الارم والی گھڑی خرید لینی چاہیے۔
کمرے میں ٹھنڈک بھی اہم کردار ادا کرتی ہے۔ گرم کے مقابلے ٹھنڈے ماحول میں سونا جسم کے لیے زیادہ آسان ہوتا ہے۔
دن کی روشنی:
ہماری باڈی کلاک سورج کے اگنے اور ڈھلنے کے اوقات کے مطابق کام کرتی ہے۔ لیکن ہم میں سے کئی لوگ صبح دیر تک سونے کی وجہ سے دن کی روشنی سے پوری طرح فائدہ نہیں اٹھا پاتے ہیں۔
صبح گھر کے پردے کھول دینے سے آپ دن کی زیادہ روشنی حاصل کرسکتے ہیں۔
اگر ہوسکے تہ صبح کا وقت ورزش میں لگانا چاہیے۔ ایسا کرنے سے رات کو نیند اچھی آتی ہے۔ .
سونے سے پہلے کرنے والے کام:
سونے سے پہلے کرنے والے کچھ کام اگر آپ ہر روز کیا کریں تو جسم کو پتا چل جاتا ہے کہ اب یہ سونے کا وقت ہے۔
کتابیں پڑھنا، گانے سننا، نہانا کچھ ایسے ہی کام ہیں۔
جیسے ہی آپ انھیں کرنا شروع کریں گے جسم خود ہی سونے کے لیے تیار ہونے لگے گا۔
بیشتر والدین بچوں کے ساتھ ایسا ہی کرتے ہیں۔ کئی والدین بچوں کو سلانے سے پہلے انہیں دودھ پلاتے ہیں یا انھیں نہلاتے ہیں۔ انھیں اکثر سونے سے پہلے کہانیاں بھی سناتے ہیں۔
ایسا ہر روز کرنے سے بچے کے جسم کو اس کی عادت ہوجاتی ہے اور جسم سمجھ لیتا ہے کہ یہ سونے کا وقت ہے۔
کیفین سے دور رہیں:
آپ نے محسوس کیا ہوگا کہ دیر رات کافی پینے سے نیند اڑجاتی ہے۔ اس کی وجہ کافی میں موجود کیفین ہوتی ہے۔
لیکن کیفین صرف کافی میں ہی نہیں ہوتی بلکہ چائے اور کئی ٹھنڈے مشروبات میں بھی ہوتی ہے۔
شام کو پی جانے والی چائے یا کافی بھی آپ کی نیند کو متاثر کرسکتی ہے کیوں کہ کیفین کا اثر ہمارے جسم پر پانچ سے نو گھنٹے تک رہتا ہے۔
Sa_Sagar#

Wednesday, 5 August 2020

برادران وطن کے تہواروں پر مبارکباد دینے کا حکم

برادران وطن کے تہواروں پر مبارکباد دینے کا حکم
حضرت مفتی صاحب دامت برکاتہم ..
السلام علیکم ورحمت اللہ
عرض ہے کہ بردران وطن کیساتھ ان کے تہوار رسمی جیسے ہولی، دیوالی، رکشا بندھن میں شرکت کرنا اسی انداز سے پوری رسم کی ادائیگی کرنا ایک مسلم کیلئے کیا جائز ہے؟ اگر کوئی ایمان والا کررہا ہے تو اس کے ساتھ کیا رویہ اختیار کرنا چاہئے. براہ مہربانی جواب سے مطلع فرمائیں، نوازش ہوگی 
العارض: عبداللہ 
دیوبند ۳۰/۸/۲۰۲۰
الجواب وباللہ التوفیق:
ہندوٴوں کے یہاں چوں کہ وحدت ادیان کا نظریہ پایا جاتا ہے؛ اس لیے وہ لوگ اسلامی تہواروں کے موقع پر مسلمانوں کو خوب دل کھول کر مبارک بادی دیتے ہیں، لیکن مذہب اسلام میں صرف اسلام ہی حق اور صحیح مذہب ہے، باقی سب مذاہب باطل ہیں؛ اس لیے مسلمان کے لیے کوئی ایسا کام جائز نہیں، جس سے غیروں کی کسی مذہبی چیز کی تعظیم وتکریم یا اس کی تعریف وغیرہ لازم آتی ہو؛ بلکہ اس طرح کی چیزوں میں کفر کا اندیشہ ہوتا ہے؛ اس لیے مسلمانوں کے لیے جائز نہیں ہے کہ وہ ہولی یا دیوالی کے موقع پر غیر مسلموں کو مبارک بادی دیں، اس میں بہت زیادہ احتیاط کی ضرورت ہے؛ البتہ اگر سخت مجبوری کی صورت ہو مثلاً کوئی ایسا کاروباری ساتھی یا ما تحت ملازم یا کمپنی کا مالک ہے کہ اگر اس موقع پر اس سے مسرت کا اظہار نہ کیا جائے تو اس کی جانب سے ضرر کا اندیشہ ہے یا ملک میں مذہب کی بنیاد پر منافرت پھیلانے والوں کو مزید منافرت پھیلانے کا موقع ملے گا تو ایسی مجبوری میں مجمل الفاظ کہنے کی گنجائش ہوگی، مثلاً یوں کہہ دے کہ میری نیک تمنائیں تمھارے ساتھ ہیں اور نیت یہ ہو کہ اللہ تعالی تم کو ایمان نصیب فرمائیں ، تہوار وغیرہ کی تعظیم یا تعریف وغیرہ ہرگز مقصود نہ ہو توشرعاً ان شاء اللہ اس کی گنجائش ہوگی۔ اجتمع المجوس یوم النیروز فقال مسلم: خوب سیرت نہاوند یکفر(الفتاوی البزازیة علی ھامش الھندیة، ۶: ۳۳۳، ط: مکتبة زکریا دیوبند)، وما یھدی المجوس یوم النیروز من أطعمتھم إلی الأشراف ومن کان لھم معرفة لا یحل أخذ ذلک علی وجہ الموافقة معھم وإن أخذہ لا علی ذلک الوجہ لا بأس بہ والاحتراز عنہ أسلم (المصدر السابق)۔
واللہ اعلم بالصواب
----------------------------------------------
سوال: کفارکو انکے تہواروں میں مبارکباد دینے کا کیا حکم ہے؟
الجواب وباللہ التوفیق:
سب علماء کا اس بات پر اتفاق ہے کہ کرسمس یا کفار کے دیگر مذہبی تہواروں پر مبارکباد دینا حرام ہے، جیسے کہ ابن قیم رحمہ اللہ نے اپنی کتاب " أحكام أهل الذمة " میں نقل کیا ہے، آپ کہتے ہیں:
"کفریہ شعائر پر تہنیت دینا حرام ہے، اور اس پر سب کا اتفاق ہے، مثال کے طور پر انکے تہواروں اور روزوں کے بارے میں مبارکباد دیتے ہوئے کہنا: "آپکو عید مبارک ہو." یا کہنا "اس عید پر آپ خوش رہیں." وغیرہ، اس طرح کی مبارکباد دینے سے کہنے والا کفر سے تو بچ جاتا ہے لیکن یہ کام حرام ضرور ہے، بالکل اسی طرح حرام ہے جیسے صلیب کو سجدہ کرنے پر اُسے مبارکباد دی جائے، بلکہ یہ اللہ کے ہاں شراب نوشی، قتل اور زنا وغیرہ سے بھی بڑا گناہ ہے، بہت سے ایسے لوگ جن کے ہاں دین کی کوئی وقعت ہی نہیں ہے ان کے ہاں اس قسم کے واقعات رونما ہوتے ہیں، اور انہیں احساس تک نہیں ہوتا کہ وہ کتنا برا کام کر رہا ہے، چنانچہ جس شخص نے بھی کسی کو گناہ، بدعت، یا کفریہ کام پر مبارکباد دی وہ یقینا اللہ کی ناراضی مول لے رہا ہے." ابن قیم رحمہ اللہ کی گفتگو مکمل ہوئی۔
چنانچہ کفار کو انکے مذہبی تہواروں میں مبارکبا د دینا حرام ہے، اور حرمت کی شدت ابن قیم رحمہ اللہ نے ذکر کردی ہے، -حرام اس لئے ہے کہ- اس میں انکے کفریہ اعمال کا اقرار شامل ہے، اور کفار کیلئے اس عمل پر اظہار رضا مندی بھی ، اگرچہ مبارکباد دینے والا اس کفریہ کام کو اپنے لئے جائز نہیں سمجھتا ، لیکن پھر بھی ایک مسلمان کیلئے حرام ہے کہ وہ کفریہ شعائر پر اظہار رضا مندی کرے یا کسی کو ان کاموں پر مبارکباد دے، کیونکہ اللہ تعالی نے اپنے بندوں کیلئے اس عمل کو قطعی طور پر پسند نہیں کیا، جیسے کہ فرمانِ باری تعالی ہے:
إن تكفروا فإن الله غني عنكم ولا يرضى لعباده الكفر وإن تشكروا يرضه لكم 
ترجمہ: اگر تم کفر کرو تو بیشک اللہ تعالی تمہارا محتاج نہیں، اور (حقیقت یہ ہے کہ) وہ اپنے بندوں کیلئے کفر پسند نہیں کرتا، اور اگر تم اس کا شکر ادا کرو تو یہ تمہارے لئے اس کے ہاں پسندیدہ عمل ہے۔ اسی طرح فرمایا:
اليوم أكملت لكم دينكم وأتممت عليكم نعمتي ورضيت لكم الإسلام ديناً 
ترجمہ: آج میں نے تمہارے لئے دین کو مکمل کردیا، اور تم پر اپنی نعمتیں مکمل کردیں، اور تمہارئے لئے اسلام کو بطورِ دین پسند کرلیا۔ لہذا کفار کو مبارکباد دینا حرام ہے، چاہے کوئی آپکا ملازمت کا ساتھی ہو یا کوئی اور۔ اور اگر وہ ہمیں اپنے تہواروں پر مبارکباد دیں تو ہم اسکا جواب نہیں دینگے، کیونکہ یہ ہمارے تہوار نہیں ہیں، اور اس لئے بھی کہ ان تہواروں کو اللہ تعالی پسند نہیں کرتا، کیونکہ یا تو یہ تہوار ان کے مذہب میں خود ساختہ ہیں یا پھر انکے دین میں تو شامل ہیں لیکن محمد صلی اللہ علیہ وسلم پر ساری مخلوق کیلئے نازل ہونے والے اسلام نے انکی حیثیت کو منسوخ کردیا ہے، اور اسی بارے میں فرمایا:
 ومن يبتغ غيرالإسلام ديناً فلن يقبل منه وهو في الآخرة من الخاسرين 
ترجمہ: اور جو شخص بھی اسلام کے علاوہ کوئی دین تلاش کریگا؛ اسے کسی صورت میں قبول نہیں کیا جائے گا، اور وہ آخرت میں خسارہ پانے والوں میں سے ہوگا۔ چنانچہ ایک مسلمان کیلئے اس قسم کی تقاریب پر انکی دعوت قبول کرنا حرام ہے، کیونکہ انکی تقریب میں شامل ہونا اُنہیں مبارکباد دینے سے بھی بڑا گناہ ہے۔
اسی طرح مسلمانوں کیلئے یہ بھی حرام ہے کہ وہ ان تہواروں پر کفار سے مشابہت کرتے ہوئے تقاریب کا اہتمام کریں، یا تحائف کا تبادلہ کریں، یا مٹھائیاں تقسیم کریں، یا کھانے کی ڈشیں بنائیں، یا عام تعطیل کا اہتمام کریں، کیونکہ نبی صلی اللہ علیہ وسلم کا فرمان ہے: (جو جس قوم کی مشابہت اختیار کریگا وہ اُنہی میں سے ہے)
شیخ الاسلام ابن تیمیہ رحمہ اللہ اپنی کتاب (اقتضاء الصراط المستقيم، مخالفة أصحاب الجحيم) میں کہتے ہیں:
"کفار کے چند ایک تہواروں میں ہی مشابہت اختیار کرنے کی وجہ سے اُنکے باطل پر ہوتے ہوئے بھی دلوں میں مسرت کی لہر دوڑ جاتی ہے،اور بسا اوقات ہوسکتا ہے کہ اسکی وجہ سے انکے دل میں فرصت سے فائدہ اٹھانے اور کمزور ایمان لوگوں کو پھسلانے کا موقع مل جائے." انتہی
مذکورہ بالا کاموں میں سے جس نے بھی کوئی کام کیاوہ گناہ گار ہے، چاہے اس نے مجاملت کرتے ہوئے، یا دلی محبت کی وجہ سے، یا حیاء کرتے ہوئے یا کسی بھی سبب سے کیا ہو، اسکے گناہ گار ہونے کی وجہ یہ ہے کہ اس نے دین الہی کے بارے میں بلاوجہ نرمی سے کام لیا ہے، جو کہ کفار کیلئے نفسیاتی قوت اور دینی فخر کا باعث بنا ہے۔ اور اللہ تعالی سے دعا ہے کہ مسلمانوں کی اپنے دین کی وجہ سے عزت افزائی فرمائے، اور انہیں اس پر ثابت قدم رہنے کی توفیق دے، اور انہیں اپنے دشمنوں پر غلبہ عطا فرمائے، بیشک وہ طاقتور اور غالب ہے۔
(مجموع فتاوى ورسائل شيخ ابن عثيمين 3/369).


Tuesday, 4 August 2020

تفسیر حکیم الامت کی عصری معنویت

تفسیر حکیم الامت کی عصری معنویت
-----------------------------------------------------------------------------------------------------------
مولانا حکیم فخرالاسلام صاحب کا مراسلہ اور حضرت مفتی تقی عثمانی صاحب دامت برکاتہم کا اظہارِ تشکر
-----------------------------------------------------------------------------------------------------------
مولانا حکیم فخرالاسلام صاحب کا مراسلہ حضرت مفتی محمد تقی عثمانی صاحب مدظلہ کی خدمت میں:
مخدومی و مکرمِی جناب مفتی محمد تقی عثمانی زیدمجد ہ 
السلام علیکم ورحمۃ اللہ
امید کہ مزاج گرامی بخیر ہونگے. خدا تعالی آپ کو صحت اور عافیت سے رکھے اورآپ سے امت کو نفع زیادہ سے زیادہ پہنچائے جو ان کے لئے دنیا وآخرت کی فلاح اور آپ کے لئے خدا کے یہاں قبول ورضا کا ذریعہ بنے۔
اس تحریر کا محرک یہ امر ہوا کہ قرآن کریم سورہ یاسین آیت 36 کی جو تفسیر آں جناب نے  کی ہے میرے خیال میں اس کی جانب ایک مرتبہ نظرالتفات اور فرمالی جائے۔ اسی کی طرف توجہ دلانے کے لیے شرف مراسلت حاصل کررہا ہون۔ 
آں جناب کی تفسیر 'توضیح القرآن' میں متذکرہ بالا آیت میں 'سبحان' کا مدلول نظر انداز ہوگیا ہے۔ وہ مدلول ایک عقیدہ ہے۔ یہاں ہم اس عقیدہ کا ذکر حضرت مولانا محمد قاسم نانوتوی رحمۃ اللہ علیہ کے الفاظ میں کرنا چاہتے ہیں. وہ فرماتے ہیں:
"جیسے  کوئی خدا کے برابر نہیں ایسے ہی کوئی برابر کی جوڑ کا بلکہ کمتر مخالف بھی نہیں جو اس کا ہونا نہ چاہے جیسا آگ  کے حق میں پانی کہ پانی آگ کے مقابل و مخالف ہے اسے بجھا دینا چاہتا ہے.
('تقریردل پذیر' ص 112، شیخ الہند اکیڈمی) 
اب اس کے بعد یہ عرض  ہے کہ آیت کے سوق کلام سے یہ محسوس ہوتا ہے کہ اس آیت میں مذکورہ عقیدے کا اظہار بھی  پیش نظر ہے. چنانچہ تفسیر 'بیان القرآن' کی صراحت کی رو سے یہ عقیدہ آیت کے مدلول کی حیثیت رکھتا ہے۔ یعنی 
سُبْحَانَ الَّذِي خَلَقَ الْأَزْوَاجَ كُلَّهَا
میں جس طرح خدا کی تخلیق کی قدرت مقابل چیزوں کا پیدا کرنا، بتانا پیش نظر ہے اسی طرح اس امر کا اظہار بھی پیش نظر ہے کہ خدا تعالیٰ کا کوئی مقابل نہیں۔ خدامقابل سے پاک ہے۔ اور جس طرح 'خَلَقَ الْأَزْوَاجَ' کا مدلول مقابل چیزوں کا پیدا کرنا ہے، اسی طرح 'سُبْحَانَ' کا مدلول مقابل سے پاک ہونا ہے۔
 یہاں اس امر سے انکار نہیں کیا جاسکتا کہ لفظ 'سُبْحَانَ' کی تفسیر دیگر طریقے سے بھی ممکن ہے، مثلا یہ کہ جب تمام مخلوقات اپنے وجود میں محتاج ہیں اور محتاج ہونا نقص اور عیب ہے تو یہ عیب مخلوقات میں تو ہے خالق میں نہیں اور خدا ہر عیب سے پاک ہے۔
لیکن اس احتمال کے باوجود عرض ہے کہ خلق الازواج کی مناسبت سے 'سُبْحَانَ' کا لانا، قرینہ مقام یہ بتاتا ہے کہ مقابل سے خدا کی پاکی بیان کرنا ہے۔ یعنی یہ بتانا  بہی مطلوب ہے کہ مخلوقات تو ایک دوسرے کے مقابل ہیں لیکن خدا مقابل سے پاک ہے۔ خدا کے برابر کی جوڑ کا کیا، بلکہ کمتر بھی مخالف کوئی نہیں۔
حکیم الامت حضرت مولانا اشرف علی تھانوی رحمہ اللہ نے اپنی تفسیر میں آیت کے مدلول کی حیثیت  سے نہ صرف اس عقیدے کا اظہار کیا ہے بلکہ لمیاتی رخ سے اس کی توجیہ بھی بیان کی ہے۔ وہ فرماتے ہیں:
"اسی قید سے کہ دو چیزوں میں خواہ كتنا ہی زیادہ اختلاف ہو اور تضاد، تضایف، عدم و ملکہ اور ایجاب وسلب میں سے کسی نوع کا بھی تقابل ہو لیکن یہ قید کہ بشرطیکہ مقولات عشر میں سے کسی مقولے کے تحت داخل ہو، سے "حق تعالی کا بے مقابل ہونا بھی معلوم ہوگیا۔ کیونکہ مقولات عشر میں سے کہ اجناس عالیہ ہیں کوئی مقولہ اس پر صادق نہیں آتا۔" یعنی "خدا پر صا دق نہیں آتا۔ دوسری طرف عالم کی کوئی شے مقولات عشر سے باہر نہیں." پس کسی موجود کے ساتھ کسی ذاتی میں اس کو شرکت نہیں۔ (بیان القرآن)
آیت کی تفسیر کے اس جز کی صراحت علامہ شبیر احمد عثمانی نے اپنی تفسیر میں بھی کی ہے، وہ  فرماتے ہیں. مخلوقات میں کوئی مخلوق نہیں جس کا کوئی مقابل یا مماثل نہ ہو۔ یہ صرف خدا ہی کی ذات پاک ہے جس کا نہ کوئی مقابل ہے نہ مماثل۔ (تفسیر شبیر عثمانی)
لیکن آں جناب کی تفسیر دوسرے جز کی توضیح وتفصیل میں محصور ہوگئی ہے اور پہلے جز کے متعین مدلول کا اظہار نظرانداز ہوگیا ہے۔
والسلام  فخرالاسلام مظاہری
نوٹ: واوین کے مابینی عبارت۔ راقم الحروف کی جانب سے توضیحی الفاظ ہیں۔
--------------------------------------------------------------
حضرت مفتی محمد تقی عثمانی صاحب مدظلہ کا مولانا حکیم فخرالاسلام صاحب کو جواب 
حضرت مولانا حكيم فخرالاسلام صاحب زيد مجدكم 
السلام عليكم ورحمة الله تعالى وبركاته 
آن جناب کی تحریر نظر نواز ہوئی جزاکمُ اللہ تعالی خیرالجزاء. آپ کے توجہ فرمانے پر تہ دل سے ممنون ہوں البتہ براہ عنایت مزید یہ رہنمائی بھی فرمادیں کہ ترجمہ کیا ہونا چاہئے جس سے مذکورہ پہلو کی رعایت ہوجائے.
احسن اللہ تعالی الیکم 
بندہ محمد تقی عثمانی عفّی عنہ
------------------------------------------------
مولانا حکیم فخرالاسلام صاحب کا مراسلہ حضرت مفتی محمد تقی عثمانی صاحب مدظلہ کی خدمت میں:
مخدو می ومكرمی حضرت مفتی محمد تقی عثمانی صاحب متعنا اللہ تعالی بطول بقاءکم وعلیکم السلام ورحمۃ اللہ۔
راقم الحروف نے جو کچھ عرض کیا تھا وہ تفسیر ی حواشی کے متعلق تھا کہ آیت کریمہ کی تفسیر کا ایک پہلو تو خاصا مفصل مذکور ہوا، دوسرا پہلو بالکل التفات حاصل نہ کرسکا۔ اس لیے ترجمہ کے بارے میں تو کچھ خدشہ نہیں ہے؛ البتہ چوں کہ التفات کا محل تفسیری حاشیہ تھا۔ اس لئے حسب الحکم حاشیہ نمبر ۱۳ کے متعلق عرض ہے کہ:
 شروع میں اس قسم کی عبا رت بڑھا دینا مناسب ہے:
"یہاں دو باتیں ہیں۔
۱: خدا تعالیٰ کی ذات پاک ہے یعنی جیسے کوئی خدا کے برابر نہیں، ایسے ہی کوئی مقابل؛ بلکہ کمتر مخالف بھی نہیں۔
۲: "اب 'توضیح القرآن' کی آگے آنے والی یہ عبارت مسلسل ہوجائے گی:
"قرآن کریم نے کئی جگہ.. الخ"
والسلام فخرالاسلام۔
--------
حضرت مولانا حكيم فخرالاسلام صاحب زيد مجدكم السلام عليكم ورحمة الله تعالى وبركاته آن جناب کی تحریر نظر نواز ہوئی جزاکمُ اللہ تعالی خیرالجزاء آپ کے توجہ فرمانے پر تہ دل سے ممنون ہوں البتہ براہ عنایت مزید یہ رہنمائی بھی فرمادیں کہ ترجمہ کیا ہونا چاہئے جس سے مذکورہ پہلو کی رعایت ہوجائے احسن اللہ تعالی الیکم بندہ محمد تقی عثمانی عفّی عنہ
---------
عام تفاسیر کا تجزیہ:
حکیم صاحب کی یہ تحریر مفتی صاحب کو بھیجی نہیں گئی ہے لیکن موقع کی مناسبت سے اسے شامل کیا جارہا ہے:
السلام علیکم!
"الازواج کلہا" کے تناظر میں "سبحان الذی" کی جو تفسیر، نیز "ازواج" کے جو معنی حکیم الامت حضرت مولانا اشرف علی تھانوی رحمہ اللہ نے اختیار کئے ہیں، دورِحاضر کے غالب فلسفہ (فلسفہ ہیگل) اور اس کے متبعین کے افکار پر نظر رکھنے والے اس تفسیر کی اہمیت  کو محسوس کریں گے۔ کیوں کہ ایک طرف تو اس فلسفہ ہیگل نے فاسد عقلی دلیل اور الٹی منطق کے سہارے عصر حاضر میں خدا کا مقابل  پیش کرکے دنیا کی عقل پر ایسا تسلط جمایا کہ خود مسلمان اہل علم اس کے فلسفے کا استحسان کے ساتھ تذکرہ کرتے ہوئے اور مفروضوں پر مبنی اصولوں میں اس کی موافقت  کرتے ھوئےاور عقل و علم میں تدریجی ارتقاء کے حوالے سے اس کے طریقہ کا ر کا استحسان ذکر کرتے ہوئے نہیں تھکتے۔ جب کہ بہ کثرت مفكرین بلا نام لئے ہو ئے اپنی تحریروں میں اسی کا تتبع کرتے ہیں۔ اگر ایسے لوگوں کے نام لئے جائیں، توآ پ حیران رہ جائیں گے کہ باین شہرت فہم و ذکا اور یہ مغالطے!۔ دوسری طرف ان کا یہ تتبع  خدا تعالی کے مقابل پیش کرنے کی راہ ہموار کرتا ہے، اس کا انہیں ادراک کیا ہوتا، احساس بھی نہیں۔ لیکن جب یہ معلوم ہوجائے کہ کسی فطری تدریجی ارتقائی طریقے سے بھی یہ ممکن نہیں کہ خدا کا کوئی مقابل یا کمتر مخالف بھی ہوسکے، تو خود کائناتی مظاہر کے علی الرغم بھی مذکورہ فلسفہ بیخ و بن سے اکھڑ جاتا ہے۔ کیونکہ کائنات کی تمام چیزیں مقولات عشر اور اجناس عالیہ  کے تحت آتی ہیں اور خدا تعالی مقولا ت عشر اور اجناس عالیہ کے تحت نہیں آتا۔ جب ایسی بات ہے، تو مقابلہ کا سوال ہی ختم ہوجاتا ہے اور عقل کی رو سے یہ عقیدہ کہ خدا اس بات سے پاک ہے کہ کوئی اس کے مقابل یا ادنیٰ درجے کا بھی مخالف  ہوسکے، بے غبار ہوجاتا ہے۔ اس طرح یہ استدلال سرپھروں پر بھی حجت تمام کرنے کے لئے قطعی برہان بن جاتا ہے۔
 یہ بات یاد رکھنے کی ہے کہ حکیم الامت حضرت مولانا اشرف علی تھانوی اور الامام محمد قاسم نانوتوی (رحمہم اللہ) نے عقلی بنیاد پر دفاع اسلام کی جو کاوشیں کی ہیں، ان میں ہر دو حضرات کے ہاں اصول موضوعہ کے درجے میں یہ امر پیش نظر رہا ہے کہ: دلیل دعوے ایسا چا ہئے جس میں مخالف دعوی کا احتمال نہ ہو۔ یہی وجہ ہے کہ سائنسی تمام اکتشافات سامنے ہونے کے باوجود مذکورہ دونوں حضرات سائنسی تطبیق و تائید کی حوصلہ افزائی نہیں کرتے۔
یہ، متذکرہ آیت کے متعلق سائنسی اکتشافا ت وتفصیلات بتانے سے ہی، خیال پیدا ہوا کہ پھر پہلے جز کی تفسیر کے ضمن میں نزاہت باری کی وہ با ت کیوں نہ بیان ہوئی کہ جس سے سائنسی تائید کے ساتھ سائنس دانوں کے  عقیدے کی مذ مت بھی سامنے آجائے۔ 
جہاں تک گزشتہ تفسیروں کی بات ہے، تو وہاں یہ سوال اس لئے پیدا نہیں ہوتا کہ پہلے کے مفسروں نے گفتگو مختصر رکھی، سائنسی تائید کی طرف اقدام نہیں کیا، مجمل و مطلق رہنے دیا۔ تفسیر جلالین میں بھی اور دیگر اہل حق کی اردو تفسیروں میں بھی ایسا ہی کیا گیا ہے۔ اور اس سے ان پر حاشاوکلا یہ الزام نہیں آتا کہ انہوں نے وہ تفسیر کیوں نہ بیان کی جو حکیم الا مت نے بیان کی ہے۔ لکن موجودہ مفسروں سے  شکایت جو کچھ  پیدا ہوئی وہ اکتشافات سائنس سے تطبیق کے باعث پیدا ہوئی۔اہل زيغ کا ذکر نہیں، جہاں تک اہل حق کی بات ہے، تو تفسیر میں سائنسی معلومات کو شامل کرنے کا رجحان علامہ شبیر احمد عثمانی سے شرو ع ہوا ہے۔ لیکن ان کے یہاں یہ خوبی ہے کہ وہ حتی المقدور مدلول نص بنانے سے گریز کرتے ہیں۔ لہذا اگر اس موقع پر ان کے طریقہ کار سے تجاوز نہ ہوتا تو اچھا تھا۔
والسلام فخرالاسلام (مراسلت ختم)






Monday, 3 August 2020

دل ‏برداشتہ ‏اور ‏مایوس ‏نہ ‏ہوں

دل برداشتہ اور مایوس نہ ہوں
حضرت شاہ عبدالعزیز دہلوی رحمت اللہ علیہ کے زمانے میں ایک ہندو پنڈت نے اعلان کیا کہ ہندو مذہب سچا مذہب ہے __ اور اسلام جھوٹا مذہب ہے __  اور دلیل اس نے یہ پیش کی کہ ہمارا فلاں مندر جو دو ہزار سال سے بنا ہوا ہے ___ آج تک بالکل صحیح سالم ہے _____ اس کی دیواریں کھڑکیاں دروازے غرض سب کچھ ویسے کا ویسے آج تک اپنی اصلی حالت میں موجود ہے. جبکہ مسلمانوں کی مساجد ایک سال بھی نہیں گزرتا کہ رنگ روغن در و دیوار دروازے کھڑکیاں سب کچھ خراب ہونا شروع ہوجاتے ہیں _____ لہذا یہ اس بات کی دلیل  ہے کہ اسلام  مٹنے والا ہے ________________ اور  ہندومت باقی رہنے والا ہے _______ مسلمانوں کی اکثریت اس پروپیگنڈا کا جواب دینے میں ناکام رہی __ اور اس کی وجہ سے لوگ بہت شش و پنج میں مبتلا ہوگئے کہ اس پروپیگنڈا کی روک تھام کیسے کی جائے؟ ________ ایسے میں حضرت  شاہ عبدالعزیز دہلوی رحمۃ اللہ علیہ آگے آئے  ___  اور آپ نے اعلان کیا کہ اس کا  جواب میں دوں گا __  پنڈت نے کہا: کیا جواب ہے؟ حضرت نے کہا کہ ایسے نہیں _ اسی مندر کے دروازہ پر جواب دوں گا __ مقررہ  وقت پر مسلمان  اور ہندو سب جمع ہوگئے کہ دیکھئے کیا جواب دیتے ہیں _ حضرت صاحب مندر کے دروازے پر کھڑے ہوگئے اور قرآن کی آیت ترجمہ (اگر اللہ تعالی اس قرآن کو پہاڑ پر نازل کرتا تو وہ پہاڑ بھی اللہ تعالی  کے جلال سے ڈرکر ٹکڑے ٹکڑے ہوجاتا) آپ آیت پڑھتے جاتے اور مندر کے درودیوار دروازوں کی طرف انگلی سے اشارہ کرتے جاتے __ ایسے میں اللہ تعالی  نے آپ کے ہاتھ پر اپنے دین کی حقانیت کی کرامت ظاہر کردی. اور مندر کی دیواریں گرنا شروع ہوگئی _ دروازے ٹوٹنے لگے ___ مسلمانوں نے اللہ اکبر کا  نعرہ لگایا. پنڈت جلدی حضرت کے قدموں میں گرگئے __  اور کہا: بس کریں بہت ہوگیا __ لیکن  اس کی حقیقت  تو بتادیں کہ یہ کیا ہوا  __  آپ نے فرمایا: اللہ تعالی  قرآن  میں فرماتا ہے کہ قرآن اگر پہاڑ پر نازل کرتا تو وہ بھی اپنی جگہ نہیں ٹہرسکتا _ 
(لَوۡ اَنۡزَلۡنَا ہٰذَا الۡقُرۡاٰنَ عَلٰی جَبَلٍ لَّرَاَیۡتَہٗ  خَاشِعًا مُّتَصَدِّعًا مِّنۡ خَشۡیَۃِ اللّٰہِ ؕ ﴿۲۱﴾)
(سورہ الحشر آیت نمبر 21: ترجمہ: اگر ہم نے یہ قرآن کسی پہاڑ پر اتارا ہوتا تو تم اسے دیکھتے کہ وہ اللہ کے رعب سے جھکا جارہا ہے، اور پھٹا پڑتا ہے۔) 
پھر اس مندر کی کیا مجال ہے ____ یہ اپنی جگہ  پر کھڑا رہتا  ___  یہ تو مسجد کی عظمت  ہے کہ   اس میں روزانہ قرآن  پڑھا جاتا ہے ______ پھر بھی اپنی جگہ پر کھڑا رہتا ہے. (تفسیر عزیزی صفحہ نمبر: 179)

तारीख सुप्रीम कोर्ट की ये चार बातें याद रखेगी 
(1) राम लला परकट नहीं हुए थे, ग़ैर क़ानूनी मूर्तियां रखी गई थीं, (2) 1949 तक मस्जिदे में नमाज़ अदा की जाती थी
(3) मस्जिद ग़ैर क़ानूनी तौर से गिराई गई थी, 
(4) मन्दिर तोड़ कर मस्जिद नहीं बनाई गई थी. 
तारीख याद रखी जाये क्यों कि तारीख़ फिर से इतिहास दोहराती है!!
http://saagartimes.blogspot.com/2020/08/blog-post_3.html?m=1

Sunday, 2 August 2020

نمازیوں کی قلیل تعداد کی صورت میں عیدین میں سجدہ سہو؟

نمازیوں کی قلیل تعداد کی صورت میں عیدین میں سجدہ سہو؟
-------------------------------
--------------------------------
اگر کوئی شخص عید کی نماز پڑھا رہا ہو اور نماز پڑھنے والے افراد دس ہوں
امام سے کوئی غلطی ہوئی جس سے سجدہ سہو واجب ہوگیا- کیا نمازیوں کی اتنی قلیل تعداد کی صورت میں سجدہ سہو ساقط ہوگا؟
الجواب وباللہ التوفیق:
........ عیدیں وجمعہ میں موجبات سہو سے سجدہ سہو اصلاً واجب ہوجاتا ہے۔ مجمع زیادہ ہو تب بھی جواز باقی رہتا ہے؛ البتہ کثرت ہجوم کے وقت اندیشہ افتنان کے باعث سجدہ سہو نہ کرنا بہتر کہا گیا ہے، جواز سجدہ کثرت ازدحام کے وقت بھی ساقط نہیں ہوتا. مذکورہ صورت میں جب افراد کم ہوں تب تو وجوب پہ لازما عمل کرے. یہاں اندیشہ فتنہ نہیں ہے کہ عدم سجدہ کی گنجائش مل سکے:
والسهو في صلاة العيد والجمعة والمكتوبة والتطوع سواء) والمختار عند المتأخرين عدمه في الأوليين لدفع الفتنة كما في جمعة البحر، وأقره المصنف، وبه جزم في الدرر.
 (قوله: عدمه في الأوليين) الظاهر أن الجمع الكثير فيما سواهما كذلك كما بحثه بعضهم ط وكذا بحثه الرحمتي، وقال خصوصاً في زماننا. وفي جمعة حاشية أبي السعود عن العزمية: أنه ليس المراد عدم جوازه، بل الأولى تركه لئلا يقع الناس في فتنة. اهـ.
(قوله: وبه جزم في الدرر) لكنه قيده محشيها الواني بما إذا حضر جمع كثير، وإلا فلا داعي إلى الترك (الدرالمختار وحاشية ابن عابدين (ردالمحتار) (2/ 92)
واللہ اعلم بالصواب 
شکیل منصور القاسمی


Saturday, 1 August 2020

قربانی کی دعاء میں ”وأنا أول المسلمين“ ہے، یا ”وأنا من المسلمين“؟

قربانی کی دعاء میں ”وأنا أول المسلمين“ ہے،  یا ”وأنا من المسلمين“؟ 
-------------------------------
--------------------------------
سوال: قربانی کا جانور ذبح کرنے سے قبل سورہ الانعام آیت نمبر 163  پڑھی جاتی ہے. اس آیت میں ”وانا اوّل المسلمین“ ہے. جبکہ ابوداؤد کی شریف کی حدیث 2795 میں یہی دعاء ”وانا من المسلمین“ آئی ہے. قربانی کے موقع سے آخر کون سی دعاء پڑھی جائے؟ کون صحیح ہے؟ اگر سورہ انعام والی آیت پڑھی جائے تو ابوداؤد شریف کی حدیث کا کیا جواب ہوگا؟ تشفی بخش مفصل جواب عطاء فرماکر ممنون فرمائیں 
سائل: محمد ذو القرنین قاسمی / بیگوسرائے 
الجواب وباللہ التوفیق:
زبان رسالت مآب کے ذریعے سکھائی جانے والی دعاؤں کی بنیادی طور پہ دو قسمیں ہیں:
۱: ایک وہ دعا ہے جو دین و دنیا کی بھلائی سے متعلق عام ومطلق واد ہوئی ہے، زمان، اوقات واحوال کی قید سے آزاد ہے۔ 
2: دوسری وہ دعا ہے جو خاص اوقات وازمنہ (صبح، شام، کھانے پینے کے اوقات وغیرہ) میں پڑھنے کے لئے وارد ہوئی ہیں یا جن کے الفاظ وکلمات کی حفاظت شریعت مطہرہ کو مقصود ہو، جیسے اذان واقامت وغیرہ یا جیسے کھانا کھانے، سونے، اٹھنے، چھینکنے وغیرہ کے وقت کی دعائیں وغیرہ قسم اوّل کی دعا میں کمی بیشی اس شرط کے ساتھ جائز ہے کہ مبادیات واصول اسلام کے معارض نہ ہو یا حداعتدال سے تجاوز نہ کیا گیا ہو. دعا کی یہ قسم 'توقیفی' نہیں ہوتی ہے. 
قسم ثانی کی دعاء میں احناف اور حنابلہ کے یہاں جواز تو ہے؛ لیکن بہتر پھر بھی نہیں. امام مالک کے یہاں اور امام شافعی کے ایک قول کے مطابق ماثور دعائوں خواہ اندرون نماز ہو یا بیرون نماز نقص واضافہ جائز نہیں ہے؛ کیونکہ آپ صلی اللہ علیہ وسلم کو اللہ نے جوامع الکلم عطا کئے تھے آپ صلی اللہ علیہ وسلم کے الفاظ میں نورانیت ہوتی ہے وہ قبولیت خداوندی کے زیادہ مستحق ہیں. دین و دنیا کی ہر بھلائی کو مستجمع ہوتی ہیں. قربانی کرنے کے وقت جو دعاء پڑھی جاتی ہے وہ دعاے استفتاح سے معروف ہے. اس دعا میں کافی عموم ہے. اس کا  صرف قربانی سے قبل ہی پڑھا جانا مخصوص و متعین نہیں ہے. نماز سے پہلے پڑھا جانا بھی مسلم کی روایت سے ثابت ہے. جب یہ عمومی نوعیت کی دعا ہوئی، اور قربانی کے علاوہ دیگر مواقع پر اس کا پڑھنا بھی ثابت ہے، تو تلاوت قرآن سے زیادہ اس کی حیثیت ”دعاء“ کی ہوئی، اور حسب مذہب احناف اس میں ملحوظ شرطوں کے ساتھ کمی زیادتی کی گنجائش ہے. قربانی کے موقع سے آپ صلی اللہ علیہ وسلم یہ دعا اس طرح پڑھتے تھے: 
ذبح النبي صلى الله عليه وسلم يوم الذبح كبشين أقرنين أملحين موجئين فلما وجههما قال إني وجهت وجهي للذي فطر السموات والأرض على ملة إبراهيم حنيفا وما أنا من المشركين إن صلاتي ونسكي ومحياي ومماتي لله رب العالمين لا شريك له وبذلك أمرت 'وأنا من المسلمين' اللهم منك ولك وعن محمد وأمته باسم الله والله أكبر ثم ذبح
(عن جابر بن عبدالله / سنن أبي داود: 2795)
(سكت عنه [وقد قال في رسالته لأهل مكة كل ما سكت عنه فهو صالح].
أخرجه أبوداود (2795) واللفظ له، وابن ماجه (3121)، وأحمد (15064)
اس روایت کے اور بھی کئی طرق ہیں، یہ حسن درجے کی روایت ہے. اس میں ”وأنا من المسلمين“ کا ذکر ہے، جبکہ اس موقع کے لیے مسلم میں ”وأنا أول المسلمين“ کا لفظ آیا ہے. نماز کے لئے قیام کے وقت بھی آپ صلی اللہ علیہ وسلم یہی دعا پڑھتے تھے، مسلم کی روایت میں اس موقع سے ”وأنا من المسلمين“ کا لفظ ہی آیا ہے: 
1451- عن رَسولِ اللهِ صَلَّى اللَّهُ عليه وسلَّمَ، أنَّهُ كانَ إذَا قَامَ إلى الصَّلَاةِ، قالَ: وَجَّهْتُ وَجْهي لِلَّذِي فَطَرَ السَّمَوَاتِ وَالأرْضَ حَنِيفًا، وَما أَنَا مِنَ المُشْرِكِينَ، إنَّ صَلَاتِي، وَنُسُكِي، وَمَحْيَايَ، وَمَمَاتي لِلَّهِ رَبِّ العَالَمِينَ، لا شَرِيكَ له، وَبِذلكَ أُمِرْتُ وَأَنَا مِنَ المُسْلِمِينَ، اللَّهُمَّ أَنْتَ المَلِكُ لا إلَهَ إلَّا أَنْتَ أَنْتَ رَبِّي، وَأَنَا عَبْدُكَ، ظَلَمْتُ نَفْسِي، وَاعْتَرَفْتُ بذَنْبِي، فَاغْفِرْ لي ذُنُوبِي جَمِيعًا، إنَّه لا يَغْفِرُ الذُّنُوبَ إلَّا أَنْتَ، وَاهْدِنِي لأَحْسَنِ الأخْلَاقِ لا يَهْدِي لأَحْسَنِهَا إلَّا أَنْتَ، وَاصْرِفْ عَنِّي سَيِّئَهَا لا يَصْرِفُ عَنِّي سَيِّئَهَا إلَّا أَنْتَ، لَبَّيْكَ وَسَعْدَيْكَ وَالْخَيْرُ كُلُّهُ في يَدَيْكَ، وَالشَّرُّ ليسَ إلَيْكَ، أَنَا بكَ وإلَيْكَ، تَبَارَكْتَ وَتَعَالَيْتَ، أَسْتَغْفِرُكَ وَأَتُوبُ إلَيْكَ، وإذَا رَكَعَ، قالَ: اللَّهُمَّ لكَ رَكَعْتُ، وَبِكَ آمَنْتُ، وَلَكَ أَسْلَمْتُ، خَشَعَ لكَ سَمْعِي، وَبَصَرِي، وَمُخِّي، وَعَظْمِي، وَعَصَبِي، وإذَا رَفَعَ، قالَ: اللَّهُمَّ رَبَّنَا لكَ الحَمْدُ مِلْءَ السَّمَوَاتِ، وَمِلْءَ الأرْضِ، وَمِلْءَ ما بيْنَهُمَا، وَمِلْءَ ما شِئْتَ مِن شيءٍ بَعْدُ، وإذَا سَجَدَ، قالَ: اللَّهُمَّ لكَ سَجَدْتُ، وَبِكَ آمَنْتُ، وَلَكَ أَسْلَمْتُ، سَجَدَ وَجْهِي لِلَّذِي خَلَقَهُ، وَصَوَّرَهُ، وَشَقَّ سَمْعَهُ وَبَصَرَهُ، تَبَارَكَ اللَّهُ أَحْسَنُ الخَالِقِينَ، ثُمَّ يَكونُ مِن آخِرِ ما يقولُ بيْنَ التَّشَهُّدِ وَالتَّسْلِيمِ: اللَّهُمَّ اغْفِرْ لي ما قَدَّمْتُ وَما أَخَّرْتُ، وَما أَسْرَرْتُ وَما أَعْلَنْتُ، وَما أَسْرَفْتُ، وَما أَنْتَ أَعْلَمُ به مِنِّي، أَنْتَ المُقَدِّمُ وَأَنْتَ المُؤَخِّرُ، لا إلَهَ إلَّا أَنْتَ. (عن علي بن أبي طالب. صحيح مسلم. (771) [صحيح].
حضرت ابراہیم علیہ السلام اپنی امت میں ”اوّل مسلمین“ تھے؛ اسی لئے اللہ نے انہیں یہ دعا سکھائی: 
قُلْ إِنَّ صَلَاتِي وَنُسُكِي وَمَحْيَايَ وَمَمَاتِي لِلَّهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ (الأنعام : 162)لَا شَرِيكَ لَهُ ۖ وَبِذَٰلِكَ أُمِرْتُ وَأَنَا أَوَّلُ الْمُسْلِمِينَ (الأنعام ١٦٢-١٦٣)
حضرت موسی علیہ السلام اپنے زمانے میں ”اوّل مومنین“ تھے:
تبتُ إليك وأنا أول المؤمنين (الأعراف ١٤٣)
ہمارے نبی صلی اللہ علیہ وسلم اپنی امت کے اولیں مسلم ہیں، اس لئے آپ صلی اللہ کی شایان شان یقیناً ”اوّل المسلمین“ پڑھنا ہی ہے. قرآنی آیت اور دیگر بعض روایت میں یہی لفظ آیا بھی ہے؛ لیکن حضرت  اسماعیل ذبیح اللہ کے مثالی تواضع ”ستجدني إن شاء الله من الصابرين“  کے امتثال و پیروی میں اپنی امت کے لئے حضور صلی اللہ علیہ وسلم نے ”وانا من المسلمین“ کی تعلیم دی ہے۔ یعنی ہم یہ بھی کہ سکتے ہیں کہ ”اوّل المسلمین“ کی تعبیر ذات رسول کے لئے ہے اور ”من المسلمین“ کی تعبیر رسول کی وساطت سے عام امتی کے لئے ہے۔ یہ دعاء دراصل خالق کائنات اور اس کے حکم عالی شان کے امتثال و اطاعت اور خود سپردگی کا مظہر جمیل ہے. اسی لئے نماز ہو یا قربانی، اس سے پہلے یہ پڑھی جاتی ہے. قرآنی آیت کے اتباع میں تلاوت کی نیت سے ”اوّل المسلمین“ پڑھنا بھی جائز ہے، اور دعاء ماثورہ کی نیت سے ”من المسلمین“ پڑھنا بھی حضور صلی اللہ علیہ وسلم ہی کے عمل مبارک سے صحیح حدیث سے ثابت ہے اور جائز ہے۔ دعاء کی حیثیت سے من المسلمین اور تلاوت قرآن کی نیت و حیثیت سے اوّل المسلمین پڑھنا ثابت ہے. حیثیت اور جہات کا فرق ہے، یہاں کوئی تعارض ہے نہ خبرواحد سے کتاب اللہ پر زیادتی والی کوئی بات ہے. موقع محل کی رعایت میں یہاں من المسلمین پڑھنا  زیادہ مناسب ہے. 
واللہ اعلم 
١٠ذي الحجة  ١٤٤١هجري